हर दिन होत न एक समान !

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रामकिशोर वर्मा जी उम्र के आखिरी पड़ाव से गुज़र रहे थे |  उनके ३ पुत्र थे |  एक दिन उनके मन में विचार आया कि क्यों न जीवन के अंतिम चरण में अपने पुत्रों को कोई ऐसी सीख दूँ, जो मेरे जाने के बाद भी इनका मार्ग प्रशस्त  करे |  यही सोचकर उन्होंने अपने सबसे बड़े पुत्र अक्षय को बुलाया और बोले – ‘बेटे ! मैनें नाश्पती के रसीले फल तो बहुत खाए हैं |  पर आज तक उसके वृक्ष नहीं देखे |  मैं चाहता हूँ कि तुम जाओ और नाशपती के वृक्ष के विषय में पता लगाकर आओ |’  अक्षय पिता की आज्ञा को शिरोधार्य कर निकल पड़ा |  कुछ महीने व्यतीत हो गए |  अब रामकिशोर जी ने अपने मंझले पुत्र सत्यम को बुलाया |  उसे भी कहा कि ‘जाओ और पता लगाओ  कि नाशपती का वृक्ष कैसा होता है ?’   इसके कुछ महीनों के बाद उन्होंने अपने तीसरे पुत्र शुभम को भी बुलाकर नाशपती के वृक्ष के विषय में पता लगाने को कहा |

फ़िर एक दिन … रामकिशोर जी ने अपने तीनों पुत्रों को एक साथ बुलाया |  उन्होंने पूछा कि क्या तुममें से  किसी को नाशपती के वृक्ष के सम्बन्ध में कोई जानकारी मिली ?  सबसे बड़ा पुत्र अक्षय बोला – ‘पिताजी ! जब मैनें नाशपती के वृक्ष को देखा, तो वह बिल्कुल सूखा था |  पुष्प विहिन और मुर्झाया हुआ था |  ऐसे वृक्ष से त नाशपती जैसे रसीले फ़ल की आशा भी नहीं की जा सकती | ‘  तभी मंझला पुत्र सत्यम बोला – ‘पर पिताजी ! मेरे अनुसार तो नाशपती का पेड़ बहुत ही हरा-भरा होता है |  पर हाँ ! मुझे उस पर फ़ल तो लगे हुए नहीं दिखाई दिए |’  अंत में छोटा बेटा शुभम बोला – ‘मैं इन दोनों की ही बलतों से सहमत नहीं हूँ |  क्योंकि जब मैंने नाशपती के वृक्ष को देखा, तो वह हरा-भरा भी था और रसदार फलों से लदा हुआ भी था |

यह सुनते ही पिता रामकिशोर ने उन्हें समझाया – ‘तुम तीनों ही अपनी-अपनी जगह सही हो |  मैंने तुम्हें एक ही वृक्ष का पता लगाने हेतु अलग-अलग मौसम में भेजा था |   वृक्ष सदा एक समान नहीं रहता है |  ऋतु के अनुसार वह पतझड़ की मार भी सहता है और बसंत की बहार से लहलहाता भी है |  उसकी  दशा परिवर्तित होती रहती है |  ठीक ऐसा ही हमारा जीवन है |  इसलिए मेरी तीन बातों को ध्यान से सुनोऔर आजीवन गाँठ बाँधकर रखना |

१.  वृक्ष के जीवनकाल में समय-समय पर पतझड़ और बहार आती है |  कभी तो पूरा वृक्ष फलों से लद जाता है, तो कभी फल तो दूर फूलों और पत्तों तक से विहीन हो जाता है |  वैसे ही, मानव जीवन में भी पतझड़-बहार रूपी दु:ख-सुख आते रहते हैं |  इसलिए दु:खक्तो स्थायी समझकर तुम कभी निराश नहीं होना |  यही सोचना कि  सभी दिन एक समान नहीं रहते |  बसंत आने वाली है |

२.  किसी भी निर्णय पर पहुँचने से पहले लंबे समय तक उसकी जाँच करो |  जिस प्रकार वृक्ष को विभिन्न ऋतुओं में परखने के बाद ही उसकी विभिन्न अवस्थाओं का ज्ञान होता है |  उसी प्रकार मनुष्य की पहचान भी एक तथ्य के आधार पर करना उचित नहीं है |  उसे अनुकूल-प्रतिकूल हर परिस्थिति में परखना चाहिए |

३.  आपस में हमेशा एक-दूसरे की बात को ध्यान से सुनना |  केवल अपनी ही बात पर मत अड़े रहना |  संकीर्ण मानसिकता से बाहर निकलकर,  अपनी सोच को विस्तृत कर, एक दूसरे की बात को महत्त्व देना |  आपस में मिलकर एकता से ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचना |

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