हर इन्सान स्वर्ग में जाना चाहता है या स्वर्ग में रहना चाहता है | जब इस जन्म में वह स्वर्ग का एहसास नहीं कर पाता है, तो वह कल्पना लोक में चला जाता है |
मृत्युपरांत स्वर्ग की कल्पना करने लगता है | ऐसी-ऐसी कल्पनाएँ करता है, जो
वास्तविकता से कोसों दूर होती हैं | अप्सराएँ नाचती हुई, अपार धन-दौलत, हीरे-
जवाहरात, हर इच्छा को पूरी करने वाले कल्पवृक्ष, काम कुछ करना नहीं और ऐशो-आराम में कोई कमी नहीं | किसने बनाई ये कहानियाँ ? ये कहानियाँ हमारे विचलित मन ने निर्मित की हैं | जब वह वास्तविकता का सामना नहीं कर पाता है | तो कल्पना में चला जाता है | किसी ने इन कल्पनाओं को किताबों में लिख दिया और हमने उन पर विश्वास कर लिया | हम ऐसी बातों पर बड़ा जल्दी विश्वास करते हैं जिनकी सत्यता को जानना सम्भव नहीं हो |    वह विश्वास नहीं है, वह हमारे मन  का चोर है | जिस काम में हम सफल नहीं हो पाते, उसे कुछ ऐसा बहाना दे देते हैं, जो हमारी उस असफलता को ढँक दे |

स्वर्ग में निवास सब करना चाहते हैं, पर स्वर्ग बनाने की तैयारी किसकी है ?
कहानियाँ बनाने से स्वर्ग थोड़े ही बन जाएगा | अच्छे घर में रहना हो, तो अच्छा घर
बनाना पड़ता है | अच्छे बगीचे में भ्रमण करना हो, तो अच्छा बगीचा लगाना पड़ता
है, तरणताल में स्नान करना हो, तो तरणताल बनाना पड़ता है | उसी प्रकार स्वर्ग
में रहना हो, तो स्वर्ग भी बनाना पड़ेगा |  स्वर्ग बनाने की तैयारी नहीं हो, तो स्वर्ग की इच्छा मत करो |  केवल माँगने से स्वर्ग नहीं मिल जाएगा | ….और स्वर्ग चाहने की बहुत गहरी इच्छा है, तो इन्तज़ार किस बात का ? इतनी उधारी क्यों ?  मृत्यु का इन्तज़ार क्यों ?  और क्या भरोसा कि मृत्यु के बाद स्वर्ग मिल ही जाएगा ? क्यों न इस  इच्छा को अभी पूरा कर लिया जाए | इस इच्छा को पूरा करना है, तो स्वर्ग बनाना पड़ेगा | अभी शुरू करना पड़ेगा | पलभर की भी देरी ठीक नहीं है | जो भी हो सकता है, अभी हो सकता है, कल का क्या भरोसा ? कल-कल करते-करते इतना जीवन तो निकल गया | निश्चित रूप से सवाल मन में आता होगा कि हमने तो कभी इस बारे में सोचा ही नहीं |  हम तो यही सोचते रहे कि जीते-जी तो स्वर्ग मिल ही नहीं सकता, ऐसी कोई तैयारी की ही नहीं | हम तो यही समझते रहे कि स्वर्ग का मामला तो मृत्यु के पश्चात् का है, मिलेगा तो मिलेगा ….नहीं तो नर्क तो भोगना ही है |
आखिर स्वर्ग है क्या ? यह कैसा होता है ? बड़ी अनोखी बात है कि जहाँ रहने की
हमारी इच्छा बड़ी प्रबल है, उसकी रूपरेखा तक हमें पता नहीं है |

स्वर्ग मात्र एक अनुभूति है | जब आप समूचे आस्तित्व से प्रेम करने लग जाते हो,  दु:ख और सुख की अवस्था में सामान्य रहते हो, क्रोध, लालच, अहंकार, वासना, घृणा आदि विकारों से अछूते रहते हो, डर का साया  आपके आस्तित्व पर नहीं होता, हर पल आनन्द अवस्था में रहते हो … बस यही स्वर्ग है |
क्या यह सब मुमकिन है ? मुमकिन तो है, पर बड़ा मुश्किल है कि नामुमकिन जैसा
लगता है | इसलिए को जीवन से अलग कर दिया गया है और उसे मृत्यु के पार ले गए | वाकई स्वर्ग नामुमकिन है तब तक, जब तक परमात्व की अनुभूति नहीं है |

स्वर्ग में रहना है, तो बड़ी तैयारी चाहिए | छोटी तैयारी से स्वर्ग नहीं मिल सकता |
हम इस अनुभूति से इतने परे चले गए हैं कि इसे वापिस लाने के लिए अभ्यास
करना पड़ेगा | एक दिन एक प्रयास करो – उठते ही अपने परिवार के प्रति बहुत अच्छे-अच्छे  विचार पैदा करो | पूर्ण सकारात्मक हो जाओ | सब शिकायतों को भूल जाओ |  आज बस निश्चय कर लो कि परिवार के साथ बहुत आनन्दपूर्वक रहना है | उनके साथ हँसना-बोलना है, खिलखिलाना है | आज उनकी इच्छाओं का ध्यान रखना है | आज के लिए यही मेरा कर्म है ! इस विचार को दिनभर हरपल याद रखो और उसका अनुसरण करो | यदि आपको महसूस होता है कि हाँ स्वर्ग यहीं है, तो इस अभ्यास को बढ़ाते जाओ, इस परिवार के दायरे को बढ़ाते जाओ और धीरे-धीरे जब इस समूचे आस्तित्व के प्रेममें पड़  जाओगे, तो यह सब कुछ तुम्हारी आदत बन जाएगा |  …और जब प्रेम हमारी प्रकृति बन जाता है, त हम अपने मूल स्वरूप में आ जाते हैं | अब जीवन में प्रतिदिन आनन्द बढ़ेगा, कम नहीं होगा |

कभी-कभी कुछ लोग बड़े महान बन जाते हैं, अपने आपको बड़ा आध्यात्मिक
समझने लग जाते हैं, दुनिया को ज्ञान देने लग जाते हैं, लेकिन अपने परिवार को
ठीक से नहीं संभाल पाते | परिवार से उनकी बनती नहीं | यह याद रख लेना, आदमी के आध्यात्मिक होने की सबसे बड़ी कसौटी यही है कि वह अपने परिवार को सबसे पहले स्वर्ग बना पा रहा है या नहीं | यह जिन्दगी को जानने का सबसे बड़ा तरीका है | सारी बड़ी-बड़ी बातें, सारी तैयारियाँ सब कुछ व्यर्थ है, यदि आप यह नहीं सीख पाए कि दूसरों के साथ कैसे निर्वाह किया जाता है ? परिवार से अलग हो जाना, अपने  आपको श्रेष्ठता का जामा पहनाकर दूसरों से विरोध कर लेना, दूसरों की चन्द कमियों के आधार पर उनसे दूरी बना लेना, यह कोई अध्यात्म की निशानी नहीं है | आपकी बहुत सारी तैयारियों के बाद यदि आपको परिवार के साथ आनन्द से रहने का तरीका नहीं आया, तो समझ लेना आपकी तैयारियों में कहीं न कहीं कमी है, क्योंकि जो अपने परिवार को स्वर्ग नहीं बना सकता, वह इस दुनिया को क्या स्वर्ग बनाएगा ? जब कोई परिवार को छोड़ा हुआ व्यक्ति दुनिया को अच्छा
बनाने की बात करता है, तो उसकी बातों में बनावटीपन लगता है | आपके परिवार वाले सारी बातें आपकी मानतें हो, फ़िर उनके  साथ आनन्द से निर्वाह कर लेना कोई बहादुरी का काम नहीं है | बहादुरी तो उसमें है, जब वे आपकी सारी बातें नहीं मानते हों, फ़िर भी आप उनके साथ आनन्दपूर्वक रहते हों |
इन्सान सबसे बड़ी गलती यही करता है कि व सबको अपने नज़रिए से देखता है
या सबको अपने जैसा बनाने की इच्छा रखता है | जब ऐसा नहीं हो पाता, तो वह
उनसे सम्बन्ध खराब कर लेता है या यह धारणा बना लेता है कि जीवन का कल्याण
करना है, तो सबसे अलग रहो | यह एक पलायनवाद है | वह सोचता है मै बिल्कुल ठीक हूँ, मैं कहीं गलती कर ही नहीं रहा हूँ, मैं क्यों अपने आपको बदलूँ और मैं अपने आपमें क्या बदलूँ | कुछ बदलने लायक है ही नहीं | बदलना तो सामने वाले को चाहिए, जिसमें बहुत कुछ बदलने लायक है | …और मैं आपको बता भी रहा हूँ कि क्या-क्या तुम्हें बदलना है, फ़िर भी वह समझता नहीं है | यदि हर इन्सान अपने जीवन पर सूक्ष्मता से निगाह करे, तो पाएँगे कि यही गल्ती थोड़ी कम या ज्यादा मात्रा में सभी कर रहे हैं | दूसरों को बदलने की कोशिश तो इन्सान बहुत कर रहा है, पर खुद को बदलने में वह बहुत कंजूस है | कभी-कभी वह सोचता भी है, निश्चय भी करता है कि अब बस मुझे अपने आपको बदलना है, पर जागरुकता के अभाव में उसका निश्चय पूरा नहीं हो पाता |
यदि इन्सान इस सोच से बाहर निकले कि मैं तो काफ़ी कुछ ठीक ही हूँ और अपने
आपमें बदलाव लाने का निश्च्य करे, तो काफ़ी कुछ बदलने योग्य मिलता जाएगा
…और यह तरीका जिस दिन हाथ लग गया, उस दिन से आपके जीवन में विशेष
आनन्द प्रवेश करता जाएगा |

दूसरों को बदलने के लिए उनको बार-बार कहो मत, इससे दूरी बढ़ती है |  वे आपके आचरण को देखकर स्वयं ही महसूस करने लगेगें | हो सकता है वे अपने आपको बदलें या नहीं भी बदलें | यह पूरा आपके हाथ में नहीं है| इस बात की ज्यादा फिक्र  करोगे या बस में जाओगे, तो फ़िर स्थिति खराब होगी | इस बात को भूलकर स्वयं को बदलते रहने पर ही पूरा ध्यान लगा दो, तो बहुत अच्छा होता जाएगा |

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