सैमुअल जैक्सन पक्का जहाजी था, परन्तु बहादुर और होशियार सैमुअल हमेशा परेशान रहता |  उसकी परेशानी का कारण था, उसकाअपना कद जो पूरा सात फुट और सात इंच था |  अपने लंबे कद के कारण, उसे अन्य लोगों के मुकाबले ज्यादा जगह की  जरूरत होती | सैमुअल के साथी अक्सर उसकी लम्बी टांगों का मजाक उड़ाते |  मजाक उड़ाने के लिए एक ओर चीज थी, वह था सैमुअल का लंबा कोट, जो किसी समय नीले आसमानी रंग का रहा होगा, पर अब वह धब्बेदार काला हो गया था |  सैमुअल अपने प्यारे कोट को हमेशा पहने रहता |

एक लंबी यात्रा के दौरान जब उसका जहाज गहरे समुद्र से  गुजर रहा था, तूफान आ गया |  लहरें ऊँची उठती जा रही थी और जहाज से इतनी तेजी से टकरा रही थीं कि मानों जहाज को टुकड़े-टुकड़े कर डालेगी |  जहाजी नावों में बैठकर भागने लगे |  जब सैमुअल नाव पर उतरने लगा, तो उसी के साथी चिल्लाने लगे -‘सैमुअल, तुम अभी जहाज  पर रहो, नाव में तो तुम चार आदमियों की जगह घेर लोगे |’

देखते-देखते सारी नावें भर गईं |  किसी ने भी सैमुअल को नाव में नहीं बैठने दिया |  हताश  और दुखी सैमुअल नावों को दूर जाते देखता रहा |  मजबूर सैमुअल ने तख्तों को रस्सी से बांधकर  राफ्ट बनाया |  उस पर वह माचिस, बिस्किट के पैकेट, और गन के साथ पानी का एक केन लेकर बैठ गया |  हवा के बहाव से राफ्ट चल पड़ा |   राफ्ट के पानी में उतरने के कुछ देर बाद समुद्र शान्त हो गया और लहरें हिलमिलकर बहने लगीं |  दो दिन  और दो दिन लगातार बहते रहने के बाद राफ्ट एक टापू के पास जा पहुँचा |  सैमुअल भी खूब थका था, सो वहीं घास पर पसर गया |  कुछ देर बाद जब उसकी आंख खुली तो वह छोटे कद के लोगों से घिरा था |  उन सभी की ऊँचाई सैमुअल के घुटने तक थी और उनका रंग हरा था |  सभी एक से कपड़े पहने थे और सिरों पर पंख सजे थे |  ये वहाँ के आदिवासियों की बस्ती थी |  इन लोगों ने इतने सफेद रंग का और इतना लंबा आदमी पहले कभी नहीं देखा था |  सैमुअल की कमर में लटकी गन को भी वह  आश्चर्य  से देख रहे थे |   तभी बहुत से सैनिकों के साथ उनका सरदार वहाँ आया |  उसने इशारों से सैमुअल को बताया कि वह उनका देवता है, जो स्वर्ग से नीचे आया है |  अत: वे  उसका सत्कार करना चाहते हैं |  इन आदिवासियों के अनुसार उनका देवता सफेद रंग का और ऊँचा होगा, यही उनके पूर्वजों ने उन्हें बताया था |

सैमुअल अब क्या करता, उसने मुस्कराकर उन्हें आशीर्वादधिया |  सैमुअल ने अपने को देवता मानते हुए अपनी गन से हवा में एक फायर किया |  और उन लोगों के साथ बस्ती की ओर चल दिया |  बस्ती के बीचोंबीच मन्दिर था |  बाहर के बड़े चबूतरे पर वह बैठ गया |  कोट उतारकर किनारे रख दिया |  वह बहुत भूखा और थका हुआ था |  आदिवासियों ने कोको, भुने बीज और फलों के टोकरे उसके सामने  रख दिए |  सैमुअल ने भरपेट खाना खाया |  उसके आने की खुशी में आदिवासी नाचने-गाने लगे |  वह तरह-तरह के करतब दिखा रहे थे |    पूरे दो दिन बस्ती में उत्सव होता रहा |  तीसरे दिन कुछ लोगों को छोड़कर बाकी अपने घरों में चले गए |  सैमुअल को भाग निकलने का मौका मिल गया |  उसने उनकी सबसे बड़ी और अच्छी नाव को पानी में उतारा |  अपनी गन और पानी का केन रख, वह वहां से निकल गया |  तेजी से चप्पू चलाता, वह गहरे समुद्र की ओर बढ़ गया |  उसकी मुश्किलें अभी भी कम न हुई थीं |  उसे न दिशा का ज्ञान था, न उसके पास खाने का सामान था |  भूखा-प्यासा वह कई दिनों तक समुद्र में भटकता रहा |

एक दिन, उसे बहुत दूर एक जहाज दिखाई दिया |  उसने अपनी नाव उधर ही बढ़ा दी |  जहाज बोस्टन जा रहा था |  उन लोगों ने सैमुअल को जहाज पर चढ़ा लिया |  इस तरह गोरा गन वाला देवता बोस्टन पहुँचकर अगली यात्रा की तैयारी में लग गया |  कई बरस बीत जाने के बाद, सैमुअल उस यात्रा को लगभग भूल गया था |  तभी एक पुराना जहाजी मिल गया |  उसने सैमुअल से उसके लंबे कोट के बारे में पूछा |  सैमुअल ने उसे सारी कहानी सुना दी कि किस तरह रात में वहाँ से भागते समय वह अपना प्यारा कोट वहां भूल गया |  सैमुअल की बात सुनकर जहाजी हंस-हंसकर लोटपोट हो गया |  फिर उसने बताया – ‘कुछ माह पहले मैं अपने जहाज के साथ उसी टापू पर  रुका था |  हमें पानी, फल व खाने का सामान चाहिए था |  अपने दल के साथ मैं बस्ती में चला गया |  वहां एक मन्दिर था, जिसमें स्वर्ग से आए देवता का कोट रखा था |  मैं अंदर चला गया और कोट देखते ही पहचान गया कि यह तुम्हारा कोट है |  मैंने उन्हें बताना चाहा पर वे सभी गुस्से से आगबबूला हो गए |  वे सभी उसकी पूजा कर  रहे थे |  उनमें से एक ने बताया कि एक दिन उनका देवता समुद्र के रास्ते यहाँ आया, वह एकदम सफेद और बहुत ऊँचा था |  उसने हमें आशीर्वाद दिया और बहुत ऊँचा था |  उसने हमें आशीर्वाद दिया और दो दिन हमारे साथ रहा |  फिर एक रात चांद की नाव में बैठकर  वापस स्वर्ग चला गया |’

जहाजी की बात सुनकर सैमुअल भी मुस्कराए बिना न रह सका |   अब उसे अपने ऊँचे कद का जरा भी अफसोस न था |

Leave a Reply