सुख और दुख

219 views

गुरूओं ने सही रास्ता बतलाया और खुद उस रास्ते पर चलकर कामयाबी हासिल करके जनता को रास्ता दिखलाया और उन्होनें बतलाया कि ईश्वर को वह समझ सकता है जिसके अन्दर खलकत का प्रेम है| हर एक जीव चाहता है कि मुझ को दु:ख न मिले| इसलिए उन्होनें बतलाया कि अगर तू सुख चाहता है तो सब जीवों को सुख देने वाला बन| अपना सुख दूसरों में तक्सीम कर| तुझे खुद ब खुद सुख मिलेगा| अगर तू ऐसा बनेगा, दुनिया में नाम रोशन होगा| अपनी रोटी में से अतिथि, अभ्यागत, यतीम, अनाथों को दे| तेरे अम्बार भरे रहेगें| तुम्हारा भला दूसरों के भले में है| ऐ मानुष तेरी कल्याण में है|
अगर तू दूसरे से दुश्मनी करेगा, तू अपने से दुश्मनी करेगा| लेकिन ये ऊँची तालीम है| इसकी समझ मुश्किल है| कुलक्षण रूप बुद्धि दुसरों के दोष तलाश करके अपने अन्दर दोष भर लेते हैं| अपने अन्दर बेएतबारी है, इसलिए दूसरों को बेएतबार समझता है|
नेक स्वभाव फरमाबरदारी, सेवा, सत्य वगैरा धर्म के रूप हैं| कानून कुदरत के मुताबिक चलने वाले लोग कामयाब होते हैं| मन्दिर वगैरा संगत के इकट्ठा होने के वास्ते बनाए गए हैं, ताकि वहाँ जाकर नेक अमल सीखें| जो पुरूष अपने शशीर की ताकत व धन दूसरों की भला ई की खातिर सरफ करता है, वो दिल का मालिक बन जाएगा| दिल के मालिक नेक स्वभाव वाले बनते हैं| जिनके अन्दर जनता की प्रीत, जनता की सेवा, और उपकार नहीं, उनको रब का पता नहीं है| महापुरूष सोचते हैं कि जैसे अपने बच्चे वैसे दूसरों के बच्चे है| वे उनकी भी सेवा करते हैं|
एक दफ़ा स्वामी रामतीर्थ एक गाँव से गुज़र रहे थे| देखा एक औरत रो रही है| रोने का सबब दरयाफ्त किया| उस औरत ने बतलाया मेरा बच्चा मर गया है| स्वामी रामतीर्थ एक बच्चे को पकड़कर लाए | उसे उस औरत के सामने करके कहा – कि ये देख बच्चा जिन्दा है, और तू कहती है वो मर गया है| उस औरत ने जवाब़ दिया – कि यह मेरा बच्चा नहीं है| स्वामी रामतीर्थ ने जवाब दिया- कि तू मेरे को रो रही है, बच्चे को नहीं रो रही है|
इस कहानी का निचोड़ यह है कि जीवन में जो कुछ भी चाहिए, वही सब कुछ देना सीखो |

Leave a reply

Leave a Reply