सिन्नी एक छोटा-सा मेमना था |  वह अपनी माँ सन्नो के साथ चंदन वन में रहता था |  वह हरे-भरे पौधों और झाड़ियों के पत्ते खाता |  नदी का ठंडा पानी पीता |  इस प्रकार वह दिन भर अपनी माँ के साथ घूमता-फिरता |   उसी वन में तेजा सिंह नाम का एक शेर भी रहता था |  वह शेर कुछ दुष्ट स्वभाव का था |  वह अकारण ही जानवरों को डराया-धमकाया करता |  वह सभी जानवरों पर धाक जमाना चाहता था |   भोले-भाले जानवर ताजा सिंह से बहुत डरा करते थे |  वे उसे देखते ही भाग जाते या छिप जाते |   तेजा सिंह की यह अकड़ देखकर सभी जानवर उससे मन ही मन घृणा करते |

एक दिन की बात है, सिन्नी मेमना अपनी माँ  सन्नो के साथ झाड़ियों के पत्ते चबा रहा था |  तभी सामने से अकड़ता हुआ तेजा सिंह आ गया |  उसे देखकर, सन्नो का तो खून ही सूख गया |  वह इतने निकट था कि भागने का भी अब कोई रास्ता नहीं था |  लेकिन उसी समय सिन्नी मेमने को एक तरकीब सूझी |  उसने तुरन्त बुद्धि से काम लेते हुए कहा -‘नमस्ते, तेजा अंकल !’
यह सुनकर तेजा सिहं की अकल चकरा गई |  सन्नो बकरी भी उसेऐसा बोलते देखकर चकित रह गई |  तेजा सिहं सोच में पड़ गया कि यह कैसा अजीब मेमना है, जो उससे बिल्कुल भि नहीं डरा ? तेजा सिहं ने भी थोड़ा शिष्टाचार दिखाते हुए कहा -‘नमस्ते, बेटा !’
अब सिन्नी ने एकखदम आगे बढ़ाते हुए कहा – ‘अंकल, कैसे हैं आप ?  बहुत दिनों के बाद दिखाई दिए !’
ऐसा सुनकर तेजा सिहं की बुद्धि फ़िर से चकराई |  एक बार तो उसके मन में आया कि झपट्टा मारकर उसे मार डाले |  जब उसने देखा कि एक छोटा-सा मेमना इतना शिष्टाचार दिखा रहा है, तो वह खुद इतना बड़ा और ताकतवर प्राणी है !  फिर वह स्वयं कैसे अशिष्ट हो सकता है ?’
तब तेजा सिहं ने कहा -‘ मैं तो ठीक हूँ, बेटा, लेकिन क्या तुमको मुझसे डर नहीं लगता ?’
-‘अरे अंकल, आपसे डर कैसा ?  आप तो हमारे राजा हैं, हमारे रक्षक हैं !  आप तो चंदन वन के सभी प्राणियों की रक्षा करने वाले हैं |  आप तो महान हैं !’
सिन्नी मेमने के मुँह से अपनी प्रशंसा सुनकर तेजा सिंह का मन झूम उठा |  उसे भी लगा कि वह चंदन वन का रक्षक है |  उसका मन परिवर्तित होने लगा | उसे  लगा कि सिन्नी मेमने की तरहह्मी चंदन वन के सब जानवर उसे अपना राजा और रक्षक समझते हैं |

अब तेजा सिहं मन ही मन सोचने लगा -‘अरे, मैं भी कितना दुष्ट हूँ | चंदन वन के प्राणी मेरा कितना सम्मान करते हैं और मैं हूँ कि इन्हें हमेशा सताने में लगा रहता हूँ |  तेजा सिहं ने खुश होकर कहा -‘बेटा, तुमने तो मेरा ह्रदय ही बदलकर रख दिया |  अब तक मैं अपने व्यवहार से कितने ही जानवरों को सता चुका हूँ, लेकिन अब मुझे आभास हुआ कि मुझे तिइनका रक्षक बनकर, इनकी रक्षा करनी चाहिए थी |’

सन्नो बकरी उनकी बातों को ध्यानपूर्वक सुन रही थी | लेकिन जो कुछ भी वह सुन रही थी, उस बात पर बड़ी मुश्किल से विश्वास कर पा रही थी |  जो तेजा सिहं एक ही झपट्टे में अकारण ही जानवरों को मार डालता था,आज स्वयं ही उनकी रक्षा करने की बात कर रहा  है |   तब सिन्नी मेमने ने कुछ सोचकर कहा -‘अंकल, आप इतने अच्छे हैं, यह मुझे नहीं पता था !  आपसे मिलकर ही पता चला कि आप बहुत-बहुत अच्छे हैं |’

अब तो तेजा सिहं शराफत का पुतला ही नजर आने लगा |  उसने बड़ी विनम्रतापूर्वक कहा – ‘बेटा, तुमने तो अच्छी-अच्छी बातें करके मेरा दिल ही जीत लिया, लेकिन तुमने अभी तक अपना नाम-पता नहीं बताया |  मैं तुमसे मिलना चाहूं, तो कैसे मिलूँगा ?’
-‘अंकल, मेरा नाम सिन्नी है और बस मैं यहीं आस-पास ही रहता हूँ |  वैसे तो पूरे चंदन वन को ही अपना घर समझता हूँ |   और यह मेरी माँ सन्नो है |  मेरे साथ ही रहती है |  अच्छा अंकल, आपसे बातें करते हुए काफी समय हो गया |  अब अनुमति दीजिए | नमस्ते |’
सिहं ने प्रसन्न होते हुए मेमने से कहा -‘अच्छा, बेटा सिन्नी, तुमको और तुम्हारी माँ जो भी मेरी नमस्ते |’ इतना कहकर वे अपने-अपने रास्ते बढ़ गए |  जैसे ही सिन्नी अपनी माँ के साथ कुछ आगे बढ़ा,  उसने कहा -‘ माँ, अब यहाँ से तेजी से भाग चलो |’
‘लेकिन बेटा, क्यों, अब क्यों भागें ! अब तो तेजा सिहं का हमें कोई डर नहीं है’ – सन्नो बोली |
-‘माँ, तू भी बहुत भोली है |  ये सब बातें तो तेजा सिहं से मैंने अपनी और तुम्हारी जान बचाने के लिए की थीं |  सौभाग्य से वह मेरी बातों में आ गया, लेकिन जैसे ही उसके मन पर मेरी बातों का प्रभाव समाप्त होगा, वह फिर से दुष्टता का व्यवहार करेगा |  माँ, दुष्टों का स्वभाव मुश्किल से ही बदलता है और तेजा सिहं का स्वभाव  है तो दुष्टता का ही |  वह बदलने वाला नहीं |  इसलिए माँ, तेजी से भाग !’

-‘तुम सही कहते हो बेटा | चलो, यहाँ से भाग चलें | पता नहीं, वह दुष्टठेजा कब अपनी दुष्टता पर उतर आए |’
इसके बाद वे दोनों सुरक्षित स्थान की ओर दौड़ पड़े |  आज सन्नो को अपने बेटे सिन्नी की बुद्धि पर गर्व हो रहा था |  उसी के कारण आज उनके जीवन की रक्षा हो सकी थी |

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