सत्य और पाखण्ड

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मनुष्य अपने जीवन पर गौर करे, तो देखने में आता है कि जीवन चल रहा है, पर उसमें वह आनंद नहीं है| कभी-कभी वह अभिषाप जैसा लगता है| जीवन पर सत्य का असर बहुत कम दिखता है, पाखण्ड का ज्यादा| यह निश्चित है कि कहीं न कहीं कुछ गलत है| क्योंकि सब कुछ सही हो, तो जीवन में इतनी नारकीयता नहीं हो सकती| हमें यह बात स्वीकार करने में देरी नहीं करनी चाहिए कि हम सामूहिक रूप से कुछ गलत कर्रहे हैं| इसे स्वीकार करनेे में हम जितनी देर करेंगे, उतनी ही देर बदलाव के लिए स्वयं को तैयार करने में लगेगी|… और यदि हम, जो चल रहा है, उसे ही मानकर आगे बढ़ते रहेंगे, तो निश्चित है कि स्थिति बद से बदतर होती जाएगी|
जीवन से जुड़े बहुत सारे विषय हैं, जिनके बारे में हम उनका सिर्फ़ एक पहलू ही सामने रखकर सोचते हैं, उनके अन्य पहलुओं के बारे में कभी सोचते ही नहीं हैं| चारों ओर हमने ताले जकड़ लिए हैं और वे ताले इतने पुराने हो चुके हैं औेर जंग खा चुके हैं कि किसी चाबी से खुलने वाले नहीं हैं| अब तो उन्हें चोट से तोड़ना ही पड़ेगा| अगे हमें इन तालों में ही बन्द रहना सुरक्षित लगता है और हमें इनमें रहने की आदत हो गई है, तो बात अलग है वरना हम इनसे बाहर आकर देखें, बाहर कितनी आजादी है, कितना आनंद है, कितना हल्कापन है|
दरअसल, हम जिंदगी को भार समझकर ढो रहे हैं और प्रतिदिन इस पर और भार चढ़ाते जा रहे हैं| हमने इस पर इतना भार चढ़ा लिया है कि यह हमें बोझ लगने लगी है| अब इतने सारे बोझ को एक-एक करके हटाएंगे, तो कभी बोझ हट नहीं पाएगा| बेहतर है कि हम पूरे के पूरे बोझ को एक साथ हटा दें|
इस दुनिया में बाहरी ज्ञान का अतुल भण्डार भरा पड़ा है| … और हम पर उसका इतना प्रभाव पड़ चुका है कि हम सब यह मान बैठे हैं कि सत्य की प्राप्ति बड़ी ही कठिन प्रक्रिया है| चन्द लोग ही उसके हक़दार हैं| हमें सबसे पहले अपनी इस भ्रान्ति को तोड़ना होगा| हम दुनिया के किसी भी मत से सहमत न हों, ताकि हमारे भीतर का विवेकखाम करना शुरू करें| जब तक हम दूसरों के मत का ही अनुसरण करते रहेगें, तब तक हमारी खुद की सोच विकसित नहीं हो सकती है| इसलिए आप थोड़े विरोधी बनें, क्योंकि विरोधी बने बिना जागृति आती नहीं है|

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