बहुत लोग सोचते हैं कि आजकल ईश्वरमय जीवन कैसे अपनाया जा सकता है ?  इतना संघर्ष का समय है हर मनुष्य के सामने जरूरतों के अम्बार हैं सिर्फ़ बच्चों का सोचें अगर इन्हें पब्लिक स्कूल में पढ़ाना है तो सैंकड़ों रूपये फीस में देने होगें |  अच्छे स्कूलों में दाखिले के लिए दान देना होगा  | स्कूल बस का, किताबों कापियों का और स्कूल में होने वाले उत्सवों का खर्चा बरदाश्त करना होगा | परिवार के बाकि लोगों की अपनी-अपनी मांगें हैं नए कपड़े, सैर के लिए होटल का खाना, टी.वी. , मोटर साईकल, स्कूटर, कार आदि | ऐसे में तो बिज़नैस मैन को चौबीस घन्टे तमाम ध्यान पैसा कमाने पर लगाना होगा जायज़ और नाजायज़ साधन, सिफ़ारिश, रिश्वत काआसरा लेकर धन अर्जित करना जरूरी लगता है | सरकारी मुलाज़िम की सुरति रिश्वत लेने, फ़ालतू टाइम के बिल, गर्वनमैन्ट की क्रय-विक्रय के काम में कमिशन, अस्पतालों में दवाईयों की क्रय-विक्रय, सामान के बिल बनवाते हुए गड़बड़ इत्यादि में लग जाती है |  इनका अक्सर जीवन तो  धनमय, ऐशमय, भोगमय बन के रह जाता है | इस मार्ग पर चलकर कोई अधिक आगे निकल जाते हैं | कोई बिल्कुल कामयाब नहीं होते और कोई बीच की हालत में समय गुज़ारते हैं | सवाल यह पैदा होता है कि असफल और पिछड़े हुए लोगों में त निराशा और अशान्ति बनी ही रहती है परन्तु यह सोचने वाली बात है कि जो लोग इस दौड़ में सफल भी हो जाते हैं तो क्या उनको मन का चैन या शान्ति प्राप्त हो जाती है |

जब शासक का शासन नाश होने लगता है, अमीर का धन क्षीण होने लगता है, परिवारी को परिवार का विनाश नज़र आता है तो वे साधु सन्तों महात्माओं की ओर भागते हैं क्यों ?  सन्त फकीरों के पास न राज्य, न धन और न संसारी वैभव, कुछ भी नहीं होता केवल ईश्वर, विश्वास और ईश्वर प्रेम होते हैं, आध्यात्मिक शान्ति होती है, वही दु:ख से पीड़ित लोगों की आवश्यकता है | सार निर्णय यह है कि शरीर, मन, बुद्धि प्रकृति से जुड़े हैं, प्रकृति पल-पल में रंग बदल रही है | इन सबका आधार आत्मा है वह शाश्वत है, नित्य है, आनंदरूप है और शान्ति का सागर है | मन और बुद्धि आत्मा के परायण होकर भी शान्ति का अनुभव कर सकते हैं उसके बिना नहीं अर्थात् मायावाद या भोगवाद में जितना चाहो लिप्त हो जाओ मन का  चैन नहीं मिलेगा | मन की शान्ति के लिए ईश्वर परायणता ही एक मात्र रास्ता है |

क्या ईश्वरमय जीवन ढीला-ढाला, सुस्त, बेलाग, धीमी गति वाला होना आवश्यक है ? बहुत लोग सोचते होगें कि जिस मनुष्य ने अपनी इच्छाएँ कम कर ली उसे संघर्ष भी कम करना होगा | सर्दियों में धूप सेक कर और गर्मियों में ठंडे स्थान पर सो कर समय व्यतीत करना होगा | न होटल का शौक, न सिनेमा का, न बच्चों को लेकर मौज मेले का | ऐसे मनुष्य को कहाँ जरूरत है कि पढ़ लिखकर अपनी योग्यताएँ बढ़ाएँ, नए हुनर सीखें और किसी न किसी काम काज में व्यस्त रहें ? ये सोचना भूल है | जिस मनुष्य के ह्रदय में ईश्वरप्रेम जागृत है उसकी इन्द्रियों के भोग भोगने की चेष्टा कम हो जाती है परन्तु जीवन के मूल्यों के प्रति जागृति बढ़ जाती है | समाज में उपस्थित गरीबी, विधवाओं, अनाथों, निर्बल वृद्ध लोगों की मजबूरी और लाचारी, समाज को पीड़ित करने वाले कारण जैसे चोरी, ठग्गी, धोखाधड़ी, बेइमानी, अविद्या, अराजकता इत्यादि सब समस्याओं में उस भले मनुष्य का ध्यान जाता है | वह चाहता है कि समाज का दु:ख दर्द कम कर सके | उसकी बुद्धि
उस पर दबाव डालती है कि वह व्यक्तिगत तौर पर और समाज का अंग होते हुए भी इस समस्त में जतन करे | अधिक पढ़ना अधिक सोचना अधिक योग्यता प्राप्त करना उसकी कोशिश के दायरे से बाहर नहीं होते | उनका अर्थ बदल जाता है | संसारी लोग जाति और पारिवारिक लाभ के लिए जतन करते हैं, ईश्वरमय जीवन जीने वाला एक विस्तृत परिवार के लिए महाकारज करने की तरफ चल पड़ता है | “सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय” इस धारणा के अन्तर्गत वह कर्म करता है |

एक और कुदरत का नियम है कि स्वार्थ पूर्ति के लिए जो कर्म किए जाते हैं वे अक्सर
दिमागी तनाव और शारिरिक थकावट अधिक पैदा करते हैं इनकी अपेक्षा जो कर्म उँचे आदर्श और उँचे मिशन को लेकर किए जाते हैं वो कम तनाव और कम थकावट देने वाले होते हैं |

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