अर्थवसु महात्मा बुद्ध का शिष्य था | वह बहुत धनी था, पर बेहद कंजूस भी था | न खुद ज्यादा खर्चता था, न अपने बच्चों को खर्चने देता था | जितना बहुत ज़रूरी होता था, बस उतना ही खर्चा करता था | अपनी कंजूसी के लिए वह पूरे नगर में प्रसिद्ध था |

एक समय आया, जब नालंदा में विश्वविद्यालय खोलने के विचार पर चिंतन किया जाने लगा | तब अर्थवसु ने पूरे “नालंदा संघ विहार” की योजना बनाई | उसकी रूप-रेखा तैयार की | फ़िर उसमें अपनी करोड़ों की सम्पत्ति समर्पित कर दी | जब यह खबर नगर में पहुँची, तो किसी को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ – ‘वह अर्थवसु, जो एक फ़ूटी कोड़ी भी खर्च नहीं करता, उसने अपनी सारी सम्पत्ति संघ विहार बनाने में लगा दी ! आश्चर्य !’

लोगों की जिज्ञासा को स्वर देते हुए महादुद्ध ने अर्थवसु से पूछा – ‘ ऐसा कैसे हो गया, अर्थवसु ? नगर तो तुम्हें धन के सम्बन्ध में बहुत कंजूस मानता है |’ अर्थवसु हाथ जोड़कर महात्मा बुद्ध के समक्ष खड़ा था | वह उनके चरणों में झुका और कहने लगा -‘आप तो सबके भीतर की जानते हैं | आपसे क्या छिपा है ?’

बुद्ध कहने लगे – ‘नहीं, हम तुमसे सुनना चाहते हैं कि तुमने ऐसा क्यों किया ?’

अर्थवसु बोला – ‘महाबुद्ध, मैं सही समय की प्रतीक्षा  कर रहा था | इंतज़ार कर  रहा
था कि किसी उचित कार्य में इस धन को लगा सकूँ | मुझे संसार में कभी कुछ भी इतना श्रेष्ठ नहीं लगा , जहाँ मैं धन को खर्च करता | परन्तु आपकी कृपा से जब मुझे नालंदा के निर्माण की सेवा मिली, तब मुझे यह सबसे उत्तम अवसर प्रतीत – जिसमें मैं अपनी सारी सम्पत्ति समर्पित कर सकता था | सच कहता हूँ, ऐसा करके मेरा मन अपार प्रसन्नता का अनुभव कर  रहा है |’

अर्थवसु के जीवन का यह दृष्टांत हम सभी के लिए प्रेरणादायक है | हमारी श्वासें भी तो अनमोल पूँजी हैं |  उन्हें यूँ ही व्यर्थ में खर्च न करें | कंजूसी से बरतें | श्रेष्ठ व सबसे उत्तम कार्यों में ही इन्हें लगाएँ, जिससे हमारी आत्म-चेतना का व समाज का निर्माण हो सके |

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