महान उद्देश्य के लिए गुरूओं ने कुर्बानियाँ दीं | सिक्ख इतिहास इन कुर्बानियों का साक्षी है | बात उस समय की है, जब नवम पातशाह श्री गुरू तेग बहादुर जी ने समाज को मुगलों के अत्याचार से मुक्त कराने का संकल्प लिया था |  उनके अनेकों शिष्यों ने भी इस लक्ष्य को साधने के लिए भीषण अत्याचार और जुल्मों को सहन किया और हँसते-हँसते कुर्बानियाँ दीं | फ़िर एक समय आया, जब मुगल बादशाह औरंगज़ेब ने गुरू साहिबान को अंतिम चेतावनी देते हुए तीन शर्तों का ऐलान करवा दिया | उसकी तीन शर्तें थीं – या तो गुरू साहिबान कोई करिश्मा दिखाएँ या धर्म परिवर्तन
कर लें या फ़िर मरने के लिए तैयार हो जाएँ | इस पर श्री गुरू तेग बहादुर जी ने कहा -‘हम करिश्मा दिखाने को मोहताज़ नहीं हैं और धर्म को तो किसी भी कीमत पर परिवर्तित किया ही नहीं जा सकता, क्योंकि धर्म शाश्वत है, सनातन है |’ तब औरंगजेब ने हुक्न ज़ारी कर दिया कि सभी के सामने गुरू का शीश कलम कर दिया जाए |
११ नवम्बर, सन् १६७५ को श्री गुरू तेग बहादुर जी को चांदनी चौक, दिल्ली में ले जाकर एक वृक्ष के नीचे बने चबूतरे पर बैठा दिया गया | गुरू साहिबान रहस्यमयी मुस्कान और दृढ़ संकल्प को धारण किए हुए विराजित हो गए | चारों तरफ़ श्रद्धालुओं, भक्तों व लोगों का तांता लग गया | जैसे ही औरंगज़ेब ने हुक्म ज़ारी किया, जल्लाद की तलवार चली और सबके देखते-ही-देखते गुरूदेव का शीश धड़ से अलग हो गया | इस दृश्य को देखकर चारों तरफ हाहाकार मच गया | प्रकृति ने भी जैसे इस कुकृत्य का साक्षी बनने पर रौद्र रूप धारण कर लिया | ज़ोरों के आंधी-तूफ़ान में सब तितर-बितर हो गया | प्रकृति ने इतना भयंकर तांडव किया कि किसी को जुछ समझ नहीं आया कि कौन किधर गिरा या कौन रौंदा गया ! प्राकृतिक रोष के आगे किसी का ज़ोर न चला |  पर गुरू भक्तों के लिए ये क्षण असाधारण थे ! निर्णायक थे ! भक्तों के विश्वास और समर्पण को कसौटी पर कसने का अनमोल समय था यह | जिन शिष्यों की प्रार्थना और साधना में सच्चाई और गहराई होती है, उनके सामने ही महान अवसर प्रकट होते हैं और उन्हें ही श्री की प्राप्ति हुआ करती है | उस समय भी, गुरू के दो प्यारों (भाई जैता और लखी शाह बंजारा ) ने शिष्यत्व की लाज रखने का श्रेय प्राप्त किया और आज तक इतिहास उनकी समर्पण गाथा के गीत गुनगुनाता है | जहाँ तेज़ आँधी-तूफ़ान के कारण किसी को कुछ भी देख पाना मुश्किल हो रहा था, वहाँ भाई जैता यदि जुछ देख पा रहा था तो अपने गुरू का शीश | उसकी नज़रें भीड़ को चीरती हुई अपने गुरू के शीश पर जा टिकीं और वह किसी भी कीमत पर अपनी दृष्टि को वहाँ से हटा नहीं सकता था | मुगल सिपाहियों की परवाह किए बिना, सारी भीड़ को चीरते हुए, भाई जैता दौड़ता हुआ अपना गुरूदेव के कटे हुए शीश के पास पहुँचा और बड़ी श्रद्धा से उसको उठा लिया | फिर छुपते-छुपाते, लगभग चार-पाँच दिन की यात्रा करके जीरतपुर, पँजाब पहुँचा | वहाँ सभी भक्तों ने मिलकर पूरे सम्मान के साथ गुरूदेव के शीश का अंतिम संस्कार किया | भाई जैता ने अपने गुरूदेव के शीश का अपमान होने से बचा लिया और अपना शिष्य धर्म निभा दिया |
वहीं दूसरी ओर, भाई लखी शाह बंजारा ने अपने गुरूदेव की पवित्र देह का मान बचाया | रूई से लदी बैलगाड़ी लेकर, भीड़ को चीरता हुआ,अपने गुरू के धड़ तक पहुँचा | अपने बेटे के साथ मिलकर गुरू साहिब की पावन देह को रूई में लपेटकर बैलगाड़ी में रखा और अपने घर की ओर रवाना हो गया | इधर जब प्रकृति का कोप थोड़ा शांत हुआ, तो हैरान-परेशान हो मुगल सिपाही गुरूदेव के शीश और धड़ को खोजने लगे | चारों दिशाओं में सिपाहियों ने अपने घोड़े दौड़ा दिए | थोड़ी दूर जाकर देखा कि लखी शाह बंजारे के घर में आग लगी हुई है | वे इसे मात्र एक हादसा समझकर आगे बढ़ गए |  लखी शाह ने अपने गुरू के पार्थिव शरीर को संस्कार करने से पहले अरदास और प्रार्थना की और उसके उपरांत ऐतिहासिक घटना घटित हूई | लखी शाह ने अपने ही घर को आग लगा दी | इस जाबांज शिष्य ने भी अपने गुरू के पार्थिव शरीर का  अपमान होने से बचा लिया और शिष्यत्व की एक बार फ़िर से जीत हुई |

जो गुरू सदैव अपने शिष्य के सम्मान की रक्षा करता है, आज ऐसे गुरू की पार्थिव देह का सच्चा सम्मान कर वे शिष्य इतिहास के मुकुटमणि बन गए |  सच्ची प्रीत निभा गए | अपना भौतिक घर जलाकर वे उस शाश्वत घर के अधिकारी बन गए |

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