रास्ते का पत्थर – ब्राउनी

244 views

टंपु बंदर खुद को बड़ा स्मार्ट समझता था |  जींस और शर्ट पहनकर हीरो बना चश्मा चढ़ाए मोबाइल पर बातें करता सड़क पर चल रहा था |  तभी ‘धड़ाम’  की आवाज़ के साथ वह सड़क पर पड़ी किसी चीज़ से टकराकर औंधे मुंह जा गिरा |  न जाने कंचनवन के निवासियों को क्या हो गया है ?  बीच सड़क पर इतना बड़ा पत्थर  रख दिया |  इसे कोई हटाता भी तो नहीं है – धूल झाड़ते हुए टंपु बुदबुदाया और लंगड़ाते हुए चल दिया |
‘तुम ठोकर खाकर गिरे हो, तुम क्यूँ नहीं हटा देते इसे ?’ – चूँ  चूँ चिड़िया ने टंपु से कहा |
‘मुझे देर हो रही है, गट्टू के घर जा रहा हूँ, वह नहीं मिला तो होमवर्क  कैसे पूरा होगा ?’ – कहते हुए टंपु आगे बढ़ गया |
जब वह नोट्स लेकर वापस लौटा, तो उसने देखा कि सड़क पर वह पत्थर उस जगह पर नहीं था |   ‘चलो अच्छा हुआ किसी ने हटा दिया, वरना न जाने मेरी तरह कितने और गिरते !’ – टंपु बुदबुदाया |

‘ओह,  हाय मेरा पांव’ – तभी सामने से फुंदकू हिरन कराहता आता दिखा |
‘क्या हुआ फुंदकू ? तुम्हें यह चोट कैसे लगी ?’ – टंपु ने पूछा |
-‘क्या बताऊँ भइया, जाॅगिंग करके लौट रहा था कि सड़क पर पड़े पत्थर से टकरा गया |  उसकी वजह से मेरी यह  हालत हुई है |’
‘इसका मतलब पार्क के रास्ते में भी पत्थर पड़ा था !’ टंपु बोला -‘यह हो क्या रहा है भाई ?’
‘मुझे तो लगता है हमारे यहां कोई विपत्ति आने वाली है |  तभी ऐसी अशुभ घटनाएँ घट रही हैं’ – भोलू गधे ने अपनी बात रखी  |

देखते-देखते यह बात पूरे जंगल में फैल गई |  हर कोई आने वाले संकट के डर से घबराया हुआ था |  एक दिन रैटू चूहा उसी पत्थर पर बैठ गया |  तभी उसे लगा कि  जिस पत्थर पर वह बैठा है, वह अपनी जगह से हिल रहा तै |
‘भूत…बचाओ… भूत !’ – पत्थर को हिलता-डुलता देख, रैटू वहाँ से सिर पर पांव रखकर भागा |  पहले तो किसी ने पत्थर  के चलने वाली बात का यकीन  नहीं किया, पर दूसरे जानवरों ने अपनी आंखों से देखा, तो यह बात सच लगने लगी |

बैडी लौमड़ एक नंबर का धूर्त और मक्कार था |  उसे लोगों को बेवकूफ बनाकर अपना उल्लू सीधा करना खूब आता था |   बैडी ने बाबा का वेश धरा और घोषणा करवा दी कि कंचनवन पर आए संकट को टालने के लिए पूजा करवानी होगी |
‘इस पूजा को करवाने में १० हजार  रूपए लगेंगे | वरना पूरा जंगल बरबाद हो जाऐगा |’ – बैडी ने कहा, तो जानवर डर गए |  इतने सारे रूपए जमा करने के लिए घर-घर से चंदस मांगा जाने लगा |
फिसी लोमड़ी ने बैडी से पूछा -‘पर तुम्हें तो पूजा आती नहीं, तुम इस संकट को दूर  कैसे करोगे ?  तुम तो अंगूठा छाप हो |’
‘मुझे किसी से क्या लेना देना ? जैसे ही ये रूपए मेरे पास आएँगे, मैं उन्हें लेकर  रात के अंधेरे में यह जंगल छोड़कर दूसरी जगह चला जाऊँगा |’ – बैडी ने राज खोला, तो फिसी हंस दी |

अगले दिन झपटु ने उससे रूपए मांगे |  उसने रूपए देने से मना कर दिया |
‘मैं इन बेकार की बातों को नहीं मानता |  क्या तुम मुझे वह पत्थर दिखा सकते हो,  जिससे टकराकर कई जानवर गिर चुकें हैं |’ – गोरू  ने पूछा तो झपटु उसे अपने साथ ले गया |  थोड़ी दूर चलने पर एक जगह वह पड़ा मिल गया |  कई जानवर दूर खड़े उस  पत्थर को देखकर डर  रहे थे |  गोरू उस पत्थर जैसी दिखने वाली चीज़ के पास गया |  गौर से उसे देखा, तभी उसमें थोड़ी हलचल हुई |  पत्थर के नीचे से किसी ने धीरे से अपना मुंह बाहर निकाला, तो गोरू चौंक गया – ‘अरे ब्राउनी, तुम? तुम यहाँ कैसे ?
‘शुक्र है, तुमने मुझे पहचान लिया, न जाने यहाँ के लोग मेरा क्या हाल करते |’ ब्राउनी बोला – ‘मैं भटकता हुआ यहाँ पहुँच गया !’
गोरू मुस्कुरा दिया |  उसकी समझ में सब आ गया | ‘डरो नहीं भाइयों, मेरे पास आओ |  मैं तुम्हें अपने दोस्त  ब्राउनी कछुए से मिलवाता हूँ |’ – गोरू ने दूर खड़े जानवरों को आवाज़ लगाई |
‘एक पत्थर तुम्हारा दोस्त ?  वह कैसे ?’ – सबने पूछा |
‘यह पत्थर नहीं, बल्कि मेरे दोस्त ब्राउनी कछुए की मजबूत पीठ है, जिसके भीतर वह अपना पूरा शरीर सुरक्षित रखता है |’ गोरू ने बताया -‘इससे मेरी दोस्ती कुछ समय पहले पहाड़ी पर हुई थी |’

-‘कछुआ ? तो क्या यह हमारी तरह एक जानवर है ?  हम इसे भूत मानकर डर  रहे थे ?’
बैडी ने अपना सिर पीट लिया -‘इस गोरू के कारण मेरा धंधा चौपट हो गया !’  गोरू ने जानवरों से कहा कि वे अपने विवेक से काम लें, ताकि कोई उन्हें बुद्धु न बना सकें |

Leave a reply

Leave a Reply