एक राजा था |  प्रजा उसे बहुत चाहती थी |  राजा भी प्रजा के सुख-दु:ख  का बहुत ख्याल रखता था |  हर  रोज़ वह घोड़े पर सवार होकर प्रजा का हाल-चाल लेने निकलता |  जहाँ जिसकी जो शिकायत होती, समस्याएँ सुनकर उन्हें दूर करने की कोशिश करता |

राजा को पेड़-पौधों और पशु-पक्षियों से बहुत प्यार था |  सड़क के दोनों किनारों पर उसने फलदार वृक्ष लगवाए थे, जिससे पैदल यात्री मनपसंद फल खा सकें |  जगह-जगह कुएँ, बावड़ी और तालाबों का निर्माण किया गया था |  बाग-बगीचे भी खूब थे | राजा को लगता था कि जिस राज्य में पानी और हरियाली भरपूर होती है, वहाँ की प्रजा बहुत सुखी रहती है |

राजा के पास तरह-तरह के घोड़े थे |  शाम को वह अस्तबल में जाता |  हर घोड़े की पीठ थपथपाकर उनका हाल-चाल पूछता |  इन सभी घोड़ों में राजा को काले रंग का घोड़ा दीपक सबसे ज्यादा पसंद था |  जब तब उसकी तारीफ भी करता |  अपने दरबारियों से कहता, “हर मुसीबत में दीपज मेरे लिए रोशनी की नई किरण लेकर आता है |  अगर यह दीपक न हि, तो मुझे सही बात पता हि न चले |  यही है, जो मुझे हर जगह पलक झपकते ही पहुँचा देता है |”

दीपक यह सुनता, तो फूला न समाता |  जैसे उसके पंख लग जाते |  जब राजा उस पर सवार होता, तो और तेज़ दौड़ता |  राजा जहाँ भी जाता, सब उसकी जय-जयकार करते |  घोड़ा सोचता, सब राजा की जय-जयकार करते, तो उसका भी मान बढ़ता है |  मगर सब राजा की जय-जयकार करते क्यों हैं ?

एक दिन अस्तबल में लौटकर उसने साथी घोड़ों से इसके बारे में पूछा |  उनमें से कइयों ने कहा कि शायद सब राजा के अच्छे कामों के कारण उनकी जय-जयकार करते हैं |  सफ़ेद रंग का एक घोड़ा जो दीपक से नाराज़ रहता था, क्योंकि राजा उसे बहुत चाहते थे, बोला, “भाई, मुझे तो लगता है कि राजा का हीरे-मोती जड़ा मुकुट लोगों को बहुत पसंद आता है |  इसलिए सब राजा का जय-जयकार करते हैं|”  सफ़ेद घोड़े की बात सुनकर बाकी घोड़े  हंसने लगे, मगर दीपक के मन में यह बात बैठ गई कि शायद सफेद घोड़ा ठीक कर रहा था |

वह सोच में पड़ गया |  राजा जैसा मुकुट आए कहाँ से ?  एक बार राजा राजकीय सुनार की दुकान की तरफ से गुजर रहे थे |  तब दीपक ने हिनहिनाकर कुछ कहना चाहा, मगर किसी को कोई बात समझ में नहीं आई |  अब घोड़ा हर वक्त इस बारे में सोचता रहता कि किस प्रकार उसे राजा जैसा मुकुट मिले और सब उसका जयकारा बोल सकें |  अब उसमें पहले जैसी फुरती न रही |  चलते-दौड़ते वह रुक जाता |  राजा के मुकुट को घूर-घूरकर देखता |
एक बार की बात, राजा ने अपना मुकुट उतारा और दूसरे कमरे में गए |  दीपक को तो शायद इसी मौके का इंतज़ार था |  उसने फौरन मुकुट अपने मुहँ में दबाया और भाग खड़ा हुआ |  दूर पहुँचकर पेड़ पर बैठे एक बंदर से उसने कहा, तो बंदर ने उसके सिर पर मुकुट पहना दिया |

खुशी के मारे दीपक के पांव ज़मीन पर ही नहीं पड़ रहे थे |  अब  वह उन जगहों की ओर चल पड़ा, जहाँ से राजा अकसर गुज़रते थे  और लोग उनके सम्मान में खड़े हो जाते थे |  जय-जयकार करते थे |  मगर किसी ने उसका जय-जयकार नहीं किया | सब उसे घूर-घूरकर देखने लगे |  कई तो उसे पकड़ने के लिए दौड़े | एक आदमी तो बोला, “अरे, इस घोड़े के सिर पर महाराज का मुकुट कैसे ? कहीं इसने मुकुट चुरा तो नहीं लिया, या यह शत्रु देश का जासूस तो नहीं, जो हमारे महाराज का मुकुट चुरा लाया हो ?  दीपक ने यह सुना तो डर गया |  कहीं सचमुच तो लोग उसे शत्रु का जासूस समझ लें और पकड़कर राज सैनिकों के हवाले ही न कर दें… अब तो उसकी जान बच ही न पाएगी |   वह  वापस महल की ओर लौट चला |  महल में कोहराम मचा था | किसकी इतनी हिम्मत  हुई कि राजा का मुकुट चुरा ले |  सैनिक मुकुट चुराने के अपराध में न जाने किस-किसको पकड़ रहे थे |  दीपक चुपके से अस्तबल के एक कोने में जाकर खड़ा हो गया , जिससे  किसी की नज़र उस पर न पड़े |  बाकि घोड़ों को भी वह अपनी आपबीती नहीं सुनाना चाहता था |  वह सोच रहा था कि जब राजा को पता चलेगा कि मुकुट उसने चुराया था, तो उन्हें कितना दु:ख होगा |  वह फिर कभी उससे इतना प्यार नहीं करेंगे, जितना अभी तक उसे प्यार करते आएँ हैं |  अब उसे पता चल गया था कि सब राजा कि जय-जयकार उनके गुणों के कारण करते थे न कि मुकुट के कारण |  जब रात हो गई तो तो दीपक चुपके से राजा के कक्ष में गया और मुकुट रख आया |

अगले दिन मुकुट को उसी जगह पर देखकर सब हैरान थे |  यह कैसा जादू था ?  इधर दीपक सोच रहा  था कि कहीं राजा को यह पता न चले कि वह मुकुट पहनकर सड़क पर दौड़ा था |

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