मन पर काबू कैसे पाएँ

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अपने मन की खाल को उतारो यानि उसका मुकाबला करो | हर समय उसके हुक्म से परहेज़ करो यानि उसका नौकर मत बनो| मन ने हर समय अनेक कामनाएँ धारण कर रखी हैं और संसारी तरंगों में लिपाएमान है | हे जीव इसका कभी साथ ना दो| बल्कि इसकी निगरानी करो, अगर ये तुम्हारे कार्य में विघन डाले तो तुम उसके कार्य में विघन डालो| ऐसा अमर देश का फ़रमान है| मन ही आत्मा और परमात्मा के बीच में दीवार है, ये आत्मा को परमात्मा से नहीं मिलने देता | जिस जीव ने मन को पहचाना, उसकी हाँ में हाँ नहीं मिलाई, उसे अपना मालिक ना मानकर अपना नौकर बनाया, वह ही अपने गुरू का प्यारा धर्ममार्ग में अग्रसर हुआ| सद्गुरू देव जी महाराज़ फ़रमाते हैं कि भगवान को पाने का यह ही सहज़ उपाय है – मन के डोलने को रोकना | जब तक जीव मन की तरगों के विपरीत नहीं चलता, तब तक भगवान की तरफ़ नहीं चलता| जब तक हम अपना ध्यान संसार से हटा नहीं देते ओर सुरति को शब्द की धारा में नहीं मिलाते तब तक मन नाम सिमरण में सहायक नहीं होता अर्थात् नाम सिमरण से ही मन एकाग्र होता है| और अन्तरमुखी होकर नाम सिमरण में सहायक होता है, और शब्द प्रगट होता है| अपने मन को जो पवन की धारा अन्दर चल रही है उसके साथ मन को लगा दे यानि नाम, पवन और मन को स्थिर करे| इस प्रकार कमाई करने से सब प्रकार की व्याधियाँ दूर हो जाती हैं| मन और पवन को जीतने पर ही ये जीव अतीत अवस्था को प्राप्त होता है| मन और पवन की सन्धि करने से उसकी लखना करने से जीव संसारी बन्धनों से स्वतन्त्र होकर प्रभु के नाम में लीन हो जाता है| योग का असली अर्थ है मन और पवन को एका करना| इससे ऊपर और कोई योग नहीं है| इसके बिना शब्द प्रगट नहीं होता और ना ही जीव के पाप नष्ट होते हैं|
यही उपदेश शिवजी महाराज ने माता पार्वती को दिया – कि मन और पवन इस योग मार्ग का आधार है| जब तक इनका साधन नहीं किया जाता तब तक ये जीव कभी भी योग साधना में प्रवृत नहीं हो सकता | सच्चा गुरू कौन है – जिसने मन और पवन की एका की है, अर्थात् दोनों को नाम के साथ मिलाकर सुन्न ध्यान में स्थित किया हो | पवन के आने औेर जाने के साथ नाम और मन को लगाकर अपने आसन को दृढ़ किया है उसी ने ईश्वर को पाया है| ये दोनों जब तक एक नहीं हो जाते तब तक ना सिमरण हो सकता है और ना ही ध्यान और समाधि लग सकती है| अपने सद्गुरू से प्राप्त की गई युक्ति को इनके साथ मिलाकर योग की साधना में जुट जाएँ, तब ही उसे ईश्वर का ठिकाना मिलेगा| पवन ही योग है और पवन ही सार है| अपने शरीर को निरोग रखने के लिए संसारी उलझनों से बचने के लिए पवन की पहचान अथवा निगरानी आवश्यक है| अश्वमेघ का यज्ञ पवन पर ही आधारित है| इस प्रकार मथना करने से अन्तर में अखण्ड नाद धुन प्रगट होकर निरंकार के दर्शन होते हैं | पवन ही गुरू है, उसके साथ मेल करने से आलख पुरूष के दर्शन होते हैं, और जीव का दसवाँ द्वार खुल जाता है| ऐसा सब कुछ पू्र्ण गुरू के मेल से ही हो सकता है|

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