मन की एकाग्रता

350 views

मन को एक विचार पर रोकने और केन्द्रित रखने को एकाग्रता और विचारों से रहित कर देने को ध्यान कहते हैं| आत्मा स्वयं शरीर से काम नहीं कराती बल्कि आत्मा की शक्ति से ये मन ही शरीर से काम कराता है| सत्य से मन शुद्ध होता है| ज्ञान से बुद्धि शुद्ध होती है| तप से आत्मा शुद्ध होती है| धर्म का पालन करने से आचरण शुद्ध होता है| ईश्वर के प्रति आस्था व समर्पण की भावना रखने पर जीव शुभ कार्य करता है और जीवन सफ़ल कर लेता है|

मन का काम है – विचार करना या इच्छा करना, लेकिन ये विचार या इच्छा शुभ है या अशुभ इसका काम नहीं है| ये कार्य विवेक का है |सत्य जिसका मन है, तप जिनकी आत्मा है, विद्या जिनकी वाणी है, ज्ञान जिनका कर्म है, दया जिनका धर्म है, सेवा जिनकी माता है, धर्म जिनका पिता है, सहयोग जिनका भाई है, शान्ति जिनकी पत्नी है, पुरूषार्थ जिनका पुत्र है, धैर्य जिनका मित्र है, भाग्य जिनका साथी है, साहस जिनका शास्त्र है, प्रभु भक्ति जिनका जीवन है, ऐसे जीव मनुष्य नहीं देवता हैं|
ईर्ष्या करने वाला, घृणा करने वाला, असन्तुष्ट रहने वाला, क्रोध करने वाला, शंका करने वाला, दूसरों के भरोसे रहने वाला, सदा दु:खी रहता है|
अपनी दौलत, अपनी कमजोरी, अपने घर के दोष, मन की योजना, मित्र के दोष, दिया हुआ दान, किया हुआ उपकार, अपने अपमान की बात की किसी से चर्चा न करें|
# किसी पुरूष से वेतन न पूछे, किसी स्त्री से आयु न पूछे, किसी स्त्री या पुरूष से आँखें मिलाकर बात न करें, और उनके साथ एकान्त में न रहें |
# जब तक अपने कार्य में सफ़ल न हो जावे तब तक उसके बारे में किसी को कुछ न बताएँ |
# कर्ज लेते समय आनन्द आता है देते समय कष्ट होता है, दुष्ट के साथ मित्रता करते समय अच्छा लगता है बाद में कष्ट होता है|
# मन की कामना पू्र्ति करते समय मज़ा आता है, जब उसके परिणाम सामने आते हैं तो कष्ट होता है| बिना सोचे समझे काम करना आसान होता है, उसके फल भोगने में कष्ट होता है|
# दान करके गुप्त रखना, घर आए शत्रु का सत्कार करना, परोपकार करके कहना नहीं, दूसरों के उपकार को प्रकट करते रहना, धन वैभव होने पर अभिमान न करना, किसी के पीछे उसकी निन्दा न करना, अपना दोष बताए जाने पर उत्तेजित न होना, इन सद्गुणों के कारण मनुष्य देवता कहलाता है| # जो अपने काम भूलकर दूसरों की सेवा किया करते हैं वे सत्पुरूष होते हैं|
# जो अपने और दूसरों के काम पूरे करते हैं वे पराक्रमी और सज्जन पुरूष होते हैं|
# जो अपना काम बनाने के लिए दूसरों के काम बिगाड़ देते हैं, वे राक्षस होते हैं|
# जैसे दूध में घृत दिखाई नहीं देता, फ़ूल में खुशबू दिखाई नहीं देती अपने में बुराई दूसरों में भलाई दिखाई नहीं देती बीज में वृक्ष दिखाई नहीं देता ऐसे ही सर्वव्यापक प्रभु हमें दिखाई नहीं देता|

Leave a reply

Leave a Reply