भक्त की प्रार्थना और साधना

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एक बार एक समुद्री जहाज का कप्तान यात्रियों को एक टापू की सैर करवाने के लिए सज्ज हो रहा था | यात्रा से पूर्व कप्तान ने अपने नियमानुसार प्रार्थना करना प्रारम्भ किया, तो सभी युवा यात्री उस पर हँसने लगे | कटाक्ष करते हुए बोले – ‘ जब मौसम अनुकूल है और समुद्र भी  शान्त है, तो इस प्रार्थना कि क्या आवश्यकता है ? यह ढ़ोग आखिर किसलिए ? कप्तान ने उनकी बातों को अनसुना करते हुए अपनी प्रार्थना  पूरी की | फ़िर जहाज़ चलाना शुरू कर दिया | अभी यात्रा करते हुए कुछ क्षण  ही हुए थे कि मौसम ने अचानक करवट बदली | समुद्री  तूफान के कारण ऊँची-ऊँची लहरें उठने लगीं | जहाज़ ज़ोर-ज़ोर से हिचकोले खाने लगा | सभी यात्री भयभीत हो उठे | अब उन्हें बचने का बस एक ही रास्ता सूझा – प्रार्थना ! सभी ने इस प्रतिकूल परिस्थिति में सामूहिक प्रार्थना करने की ठानी | वे कप्तान के पास पहुँचे और उसे भी प्रार्थना में शामिल होने के लिए कहा | तब जानते हैं, कप्तान ने क्या कहा – ‘ I say my prayers when it is calm; when t is rough I attend my ship.  I have faith that as I have prayed n calm conditions so He will save me in harsh conditions. ‘ अर्थात् मैं प्रार्थना तब करता हूँ जब सब कुछ शान्त होता है | जब मेरा जहाज तूफ़ानों के बीच फँसा होता है, तब मैं उसे कुशलता से खेने के कर्म में संलग्न हो जाता हूँ | और मुझे विश्वास है कि शान्त चित्त से व शान्त समय में की गई प्रार्थना का फल वह ईश्वर मुझे अवश्य देगा | संकट के इस समय में शक्ति बनकर मेरे साथ रहेगा |

इसी बात को समझाते हुए, संत कबीरदास जी का प्रसिद्ध  दोहा है –

दु:ख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय |
जो सुख में सुमिरन करे, तो दु:ख काहे को होय ||

एक महात्मा जी ने इसी बात को समझाते हुए कहा है – ‘ आग लगने के बाद कुआँ नहीं खोदा जाता | कुआँ तो पहले खोदकर रखना पड़ता है ताकि आग के समय उसके पानी का उपयोग कर बचा जा सके |’
आज हमें भी अपना आकलन करना होगा कि हम कब और कैसी प्रार्थना या साधना करते हैं | जब हमारी प्रार्थना-साधना नियमानुकूल होती है, केवल वही निर्णायक घड़ियों में साहस व बलिदान का कर्मठता व समर्पण का जौहर दिखला पाते हैं |  साधना, पुरूषार्थ और अंतह्रदय से की गई प्रार्थनाओं की शक्ति उनका संबल बन जाती है | गुरू उन्हें कुछ विशेष करने का अवसर देते हैं और इतिहास में फ़िर उनकी गाथा अमिट हो जाती है |
हमारे गुरू महाराज जी ने ज्ञान की अतुलनीय विरासत से हमारी झोलियाँ भर दी हैं | वे अपनी असीम करूणा व प्रेम की संपदा हम पर लुटाते रहे हैं | पर कहीं हमारे विश्वास और श्रद्धा का पात्र इतना छोटा तो नहीं कि उसमें उनकी अनंत कृपा समा ही न सके | कहीं हमारी अवस्था भी उस नौसिखिए मछुआरे जैसी तो नहीं है, जो हाथ में आई हुई सम्पदा को लुटा देता है |  दो मछुआरों की गाथा है | कहते हैं कि इन दो मछुआरों में से एक अनुभवी था और दूसरा नौसिखिया | दोनों मछलियाँ पकड़ने जाते, तो हर बार एक ही बात होती | अनुभवी मछुआरा जब कोई बड़ी मछली पकड़ता, तो खुश होकर उसे बर्फ की सिली पर सुरक्षित रख देता | लेकिन जब नौसिखिया मछुआरे के जाल में बड़ी मछली फ़ँसती, तो वह उसे वापिस समुद्र में फेंक देता और केवल छोटी-छोटी मछलियाँ ही एकत्रित करता | एक बार अनुभवी मछुआरे ने पूछ ही लिया -‘आखिर बड़ी मछली को वापिस फेंक देने का कारण क्या है ? इस पर नौसिखिए मछुआरे ने कहा – “मैं बड़ी मछलियाँ इसलिए फेंक देता हूँ, क्योंकि मेरे पास बड़ी मछली पकाने के लिए कोई बड़ी कढ़ाई नहीं है | है न हास्यास्पद !

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