बोझ उठाने का महासूत्र

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बोझ उठाने का महासूत्र

मानसकार बताते हैं, एक बार श्रीराम से किसी ने पूछा – ” प्रभु, वन प्रवास के समय आप भी पक्षपाती हो गए! ताड़का पर अमोघ बाण चलाया, उसके प्राण हर लिए| पर अहिल्या पर परद-चरण रख दिया| उसे नवप्राण देकर चैतन्य कर दिया| थे तो दोनों आपकी ही सृष्टि के जीव! फिर ऐसा पक्षपात क्यों प्रभु ?”
उत्तर बड़ा स्पष्ट और स्वभाविक था | प्रभु चाहते तो साफ़ कह देते| ‘ अरे भाई, मैं महावैद्य हूँ | मैं जानता हूँ, किस रोगी को कौन सा उपचार देना है | यह पक्षपात नहीं न्याय था |….’ बहुत बड़ी-बड़ी दलीलें दे सकते थे प्रभु | परन्तु उन्होनेऐसा कुछ नहीं कहा | इनमें से किसी भी भाव का वर्णन मानस में नहीं मिलता| एक अन्य ही भाव उजागर होता है | प्रभु कहते हैं – ” यह पक्षपात नहीं भाई, गुरू आज्ञा का पालन है| जब अहिल्या समक्ष आई, गुरूदेव ने निर्देश दिया – *”गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर| चरण कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर||*
अर्थात् इस श्रापित गौतम नारि का चरण रज द्वारा उद्धार करो | सो मैंने वही किया|
जब ताड़का से आमना-सामना हुआ, तो गुरूदेव ने शरसंधान करने की आज्ञा दी | सो मैंने उसी का पालन किया- *”एकहिं बान प्रान हरि लीन्हा| दीन जानि ताहि निज पद दीन्हा ||*
अत: बन्धु, मैनें निर्णय लिया, न न्याय किया| मैंने केवल गुरू-आज्ञा को शिरिधार्य किया” यत्र-तत्र-अन्यत्र ऐसी ही गुरू-महिमा साक्षात् अवतार के मुख से मानसकारों ने बुलवाई है |
पंचवटी की सभाआपना निर्णय सुना चुकी थी| भरत को अयोध्या का भावी राजा घोषित कर दिया गया था | इसमें बड़े भैया राम का भी प्रेमपूर्वक आग्रह शामिल था| भरत अत्यन्त विकल था| अश्रुधारा निर्बाध बही जा रही थी| बड़ा अलग सा गणित था! भरत ऐसे रि रहा था, जैसे उसे राज्य चलाने का नहीं, उससे निष्कासित होने काआदेश मिला हो!
भारी संवेदना के साथ उसने कहा – “भैया, आप तो मेरी योग्यताएँ जानते हैं न | बताइए, भला मैं अयोध्या का राज्यभार कैसे संभाल पाऊँगा? क्या इस बोझ को उठाने में मेरे कँधे समर्थ हैं?
श्रीराम ने भरत के सिर को प्यार से सहलाया| फिर गुरू वशिष्ट पर दृष्टि केन्द्रित करते हुए कहा – “भरत! बोझ उठाने के दो तरीके होते हैं | एक तो, उसे सीधे उपर उठा लेना, उसमें भुजबल लगता है| बोझ का बोझ अनुभव होता है| यदि तुम राज्य-भार को भी निज बल से उठाओगे, तो थकान की अनुभूति होगी| संभव है कि तुम उसे उठा ही न पाओ|”
*भरत (विनीत भाव से)*- भैया, फिर बोझ उठाने का दूसरा तरीका कौन सा है?
*श्रीराम* – अपने बोझ को तराजू पर रखो| तुमने तराजू पर भार तुलते देखा है न! एक पलड़े में अपना भारी बोझ रखते हैं, दूसरे पलड़े में उससे भी भारी वस्तु रखते हैं| ऐसे में तुला झुककर टेड़ी हो जाती है| कौन सा पलड़ा ऊँचा और कौन सा नीचे होता है तब?
*भरत* – हल्के वाला ऊँचा और भारी वाला नीचे होता है|
*श्रीराम* – ऐसे ही मेरे भाई भरत, तू एक पलड़े में अपना राज्य भार रखना, दूसरे में उससे भी अति भारी, संसार का सबसे गुरूत्व कण रखना| तब राज्य भार वाला पलड़ा अपनेआप हल्का अनुभव होगा| और सबसे भारी बात, बिना उठाए ही वह स्वंय ऊँचा उठ जाएगा| तुझे अहसास ही नहीं होगा कि तू भार का वहन कर रहा है|

भरत – भैया, संसार का वह सबसे गुरूत्व (भारी) कण कौन-सा है?
प्रभु श्रीराम अपने गुरूदेव वशिष्ट जी के श्री चरणों में नतमस्तक हुए| उन्हें परसा और यह वाणी कही – *”देसू कोसु परिजन परिवारू| गुरू पद रजहिं लाग छरूभारू||*
अर्थात् गुरू चरणों की रज इतनी भारी है कि परिवार, परिजनों, गाँव, देश आदि से जुड़े हर भार को वह हल्का बना देती है| इसलिए मेरे अनुज! जब भी राज्य भार या जीवन भार ‘बोझ’ लगे, गुरूवर के चरणों की धूल अपने शीश पर धारण कर लेना| सब हल्का लगने लगेगा|

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