बुरा जो देखन मैं चला…

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तक्षशिला – भारत का प्राचीन व महान शिक्षा-केन्द्र ! देश-विदेश से विद्यार्थी यहाँ शिक्षा प्राप्त करने आते थे | पूरे विश्व में तक्षशिला के नाम का डंका बजा करता था |

उस दिन तक्षशिला में दीक्षांत समारोह था | उपाधि पाने वाले सभी विद्यार्थी विश्व-प्रांगण में उतरने को लालायित थे | इन्हीं विद्यार्थियों में से एक था – जीवक ! उसने तक्षशिला के चिकित्साशास्त्री के मार्गदर्शन में सात वर्षों तक चिकित्सा विज्ञान पर गहन अध्ययन व शोध किया था | आज शिक्षण अवधि समाप्त होने पर उसके आचार्य उसकी  परीक्षा लेना चाहते थे | वे जीवक की व्यावहारिक बुद्धि को जाँचना चाहते थे | इसलिए जब जीवक की उपाधि ग्रहण करने उनके समक्ष आया, तो उन्होंने उसके हाथ में फावड़ा पकड़ा दिया | बोले -‘तुम्हारी अभी एक परीक्षा शेष है | जाओ, तक्षशिला की आठों दिशाओं में जाओ और कोई एक ऐसा पौधा  ढूँढ़कर लाओ जिसमें एक भी गुण न हो , जिसका कोई औषधीय मूल्य न हो |’

जीवक आचार्य की आज्ञा पाकर तत्क्षण ऐसे पौधे की खोज में निकल गया | दिन-पर-दिन गुज़रते गए | तक्षशिला का चप्पा-चप्पा छान मारा | पर जीवक को सफ़लता न मिली | यह पहली बार था कि जीवक किसी परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने की कगार पर आ खड़ा हुआ था | मायूस स्वर में उसने अपने आचार्य से कहा -‘गुरूवर, मुझे क्षमा करें | मैं अपकी आज्ञा पूरी नहीं कर सका | मुझे लाख प्रयत्न करने पर भी कोई ऐसा पौधा नहीं मिला, जो गुणरहित हो | हर पौधे में कोई-न-कोई औषधीय गुण दिखाई दे ही जाता है | मैं आपकी इस परीक्षा में…’   इससे पहले कि जीवक अपना वाक्य पूरा करता,आचार्य ने उसे उपाधि से विभूषित करते हुए कहा – “अनुत्तीर्ण नहीं, उत्तीर्ण हुए तुम इस परीक्षा में भी, वत्स ! “

यह दृष्टांत जीवन में सफ़ल होने का एक मुख्य सूत्र देता है | वह सूत्र है – सकारात्मक दृष्टि ! जब आपकी दृष्टि हर वस्तु व व्यक्ति में गुण देखना सीख जाती है, तो आप गुणी हो जाते हैं |  आप हर परिस्थिति में जब अच्छाई ढूँढंने  की कला जान जाते हैं, तो आप अच्छे बन जाते हैं |  आपका गुणी और अच्छा होना आपको सफलता के बहुत नज़दीक ले जाता है |

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