बुढ़िया रानी – दादी रानी या नानी रानी

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वह थी तो ७० वर्ष की बुढ़िया, फिर भी अपनी जिद में वह सात साल के बच्चे की तरह थी |  उसके छोटे से मोहल्ले में बच्चे उसे बुढ़िया रानी पुकारते थे |  एक हाथ में लाठी  और दूसरे हाथ में अखबार लेकर जब वह घर के बाहर आती, तो बच्चे उसे ‘बुढ़िया रानी- बुढ़िया रानी !’ कहकर घेर लेते |  बच्चों से हर  रोज़ उसकी यही जिद रहती कि वह बच्चों को मज़ेदसर कहानी सुनाएगी, पर वे उसे बुढ़िया रानी नहीं, बल्कि दादी, नानी, काकी या ताई जैसे किसी प्यारे से संबोधन से बुलाया करें |

यह बात रोज की थी | बच्चे उससे रोज नई-नई कहानी सुनते थे |  फिर उसे ‘बुढ़िया रानी -बुढ़िया रानी !’ कहकर चिढ़ाते हुए खेलने के लिए भाग जाते |  बुढ़िया रानी बच्चों पर लाठी तानकर कहती – ‘ठीक है, मेरे पास अब तुम कभी मत आना !’  बुढ़िया रानी और बच्चों में अजब-सा रिश्ता बन चुका था, जिसके कारण बच्चे बुढ़िया रानी की तरफ खिचें चले आते थे | वहीं बुढ़िया को भी बच्चों के बिना चैन  नहीं मिलता था |   अपनी मोज-मस्ती में जब बच्चे बुढ़िया रानी को नहीं पूछते थे, तो बुढ़िया किसी न किसी शरारती बच्चे को आवाज देकर बताना नहीं भूलती -‘मैंने कल एक मजेदार कहानी पढ़ी है |’ उसकी इस बात का यह अर्थ होता कि किसी तरह से बच्चे उसके इर्द-गिर्द जमा हो जाएं ओर कहानी सुने |  आज एक बार फिर बुढ़िया रानी ढेर सा रे बच्चों के बीच थी |  बच्चों की फरमाइश थि – ‘हमें कोई नई कहानी सुनाओ |’   हर  रोज़ की तरह बुढ़िया रानी की वही पुरानी शर्त  थी -‘मुझसे कहानी सुननी है तो पहले ये वादा करना होगा कि आज से बच्चे मुझे बुढ़िया रानी नहीं कहोगे, बल्कि दादी, नानी, काकी या ताई जैसा कोई संबोधन करेंगे |’

बच्चों ने एक-दूसरे से आंखों ही आंखों में बात करके झट से कहा -‘नानी कहानी सुनाओ !’  ‘दादी कहानी सुनाओ ‘  ‘काकी कहानी सुनाओ !’  ‘ताई कहानी सुनाओ !’  बुढ़िया रानी ने खुश होकर राजा रानी की एक नई मजेदार कहानी सुना दी |  कहानी खत्म हुई ही थी कि उसने बच्चों को आवाज सुनी -‘अच्छा बुढ़िया रानी जी, अब हम चलता हैं |  ‘बुढ़िया रानी’ सुनते ही उसने आगबबूला होकर अपनी लाठी हाथ में ले ली, पर तब तक बच्चे वहां से फुर्र हो चुके थे |  आज फ़िर बुढ़िया रानी की जीत हार में बदल चुकी थी |  उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह इन शरारती बच्चों से जीत पाएगी भी या नहीं |  उस दिन भी बुढ़िया रानी की नज़रें बच्चों के खेल पर ज़मी थी कि उसे बंदरों का झुंड दिखाई दिया |  बच्चों को बंदरों के झुंड से सावधान करने के लिए बुढ़िया रानी उनकी तरफ बढ़ ही रही थी कि एक बच्चे ने पत्थर उठाकर बंदरों के झुंड की तरफ  फैंक दिया | बंदर उनकी तरफ बढ़ने लगे |  बंदरों के झुंड को अपनी तरफ आता देखकर बच्चे डर गए |  तभी उन्होंने बुढ़िया रानी कि अपने करीब पाया |  उसने अपनी लाठी इतनी तेजी से घुमाई कि बंदरों का झुंड जितनी तेजी से आया था, उतनी ही तेजी से वापस भागने लगा |

बच्चों के प्यार ने बुढ़िया रानी को लाठी घुमाने की ताकत तो दी थी, परंतु लाठी घुमाने के कारण बुढ़िया रानी गिर पड़ी |  उसके  खून निकल आया |  बच्चों ने बुढ़िया रानी के जख्मों पर मरहम लगाया | बच्चे कह रहे थे -‘ आज आप नहीं आतीं, तो बंदर हमें नहीं छोड़ते !’  बुड़िया रानी ने बच्चों जी बात का कोई जवाब नहीं दिया, क्योंकि अभी बच्चों से उसकी लड़ाई हुए ज्यादा वक्त नहीं हुआ था |  बुढ़िया रानी लाठी उठाकर कदम दो कदम ही बढ़ी थी कि बच्चों की आवाज़ सुनाई दी  -‘बुढ़िया रानी,  आज से हम आपको ‘दादी रानी ‘ कहा करेंगे |

‘दादी रानी’का संबोधन सुनकर बुढ़िया रानी की आंखों में आंसू आ गए |  उसके दर्द का एहसास इन आंसुओं में बहकर जैसे गुम हो रहा था, क्योंकि उसने आज बच्चों का दिल जीत किया था |

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