बच्चे की जिद और तेनालीराम

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बच्चे की जिद और तेनालीराम
दादी माँ के मुख से

एक बार  राजदरबार में किसी जरूरी मामले पर सोच-विचार होना था | ंपर तेनालीराम अभी तज नहीं पहुँचा था |  राजा कृष्णदेव राय गुस्सा थे |  तभी तेनालीराम ताजी से आता दिखाई दिया |
‘तेनालीराम, कहाँ रह गए थे तुम ?’ – राजा ने गुस्से में पूछा |
‘क्षमा करें महाराज !’ तेनालीराम बोला -‘ रास्ते में कुछ शरारती बच्चे मिल गए थे |  उन्होंने अपनी बातों में कुछ ऐसे उलझा दिया कि न चाहते हुए भी देर हो गई |  बच्चे के आगे तो हर किसी को झुकना ही पड़ता  है |’
‘मगर क्यों ! यह तो ठीक नहीं है ?’ – राजा ने कहा | तेनालीराम ने फिर अपनी बात दोहराई, तो
उन्होंने कहा -‘अगर ऐसा है, तो तुम्हें अपनी बात साबित करनी होगी तेनालीराम |’
‘ठीक है, महाराज !  मैं बच्चों को बुलाता हूँ |’  थोड़ी देर में ही बच्चे आ गए ओर  राजा का अभिवादन करके बड़े मजे में उनसे बातें करने लगे |  इतने में एक छोटा बच्चा पुरू तुतलाते हुए बोला  -‘ महाराज, मैं चाहता हूँ कि बढ़िया सी टोपी पहनकर हाथी पर बैठकर घूमूं !’  उसी समय टोपी और हाथी का प्रबन्ध हो गया |
‘महाराज मैं कुछ और चाहता हूँ !’ – पुरू एकाएक ठिठककर बोला |
‘ठीक है वह भी बता दो !’ राजा के कहने पर पुरू ने इच्छा प्रकट की -‘महाराज, मैं पहले हाथी को पानी में तैराना चाहता हूँ |  आप हाथी से कहिए कि वह मेरी टोपी को ही नाव समझकर उसमें आकर बैठ जाए |  फिर मैं बड़े मजे से उसे अपनी हौदी में तैराऊंगा !’  कहकर बच्चे ने टोपी उतारकर जमीन पर  रख दी |

देखकर राजा परेशान हो गए |  बोले – ‘पर भई, तुम्हारी टोपी तो नाव नहीं है न !’
‘नहीं-नहीं नाव जैसी ही तो है मेरी टोपी !’ पुरू ने ज़िद कि – ‘आप हाथी से कहिए कि मेरी टोपी में आकर बैठ जाए |  यह मेरी हौदी में तैरेगा, तो मुझे बहुत मजा  आएगा |  फिर मैं हाथी पर बैठकर घूमने जाऊँगा |’
राजा ने बहुत समझाया, पर बच्चे की जिद कम होने की बजाय बढ़ती गई और वह रोने लगा |  हारकर राजा ने तेनालीराम की ओर देखा |  राजा को परेशान देखकर तेनालीराम ने कहा -‘महाराज, आप तो कह रहे थे कि बच्चे कि बहलाना इतना मुश्किल नहीं होता, तो अब इस बच्चे की इच्छा पूरी कीजिए न !’

इस पर फौरन राजा ने हंसते हुए कहा – ‘ठीक है तेनालीराम ! तुम्हारी बात समझ में आ गई कि बच्चे को मनाना वाकई कठिन है !  पर भई, अब तुम्हीं इसे बहलाओ |’ सुनकर तेनालीराम ने पुरू को गोदी में उठाया और प्यार से बोला -‘बेटा, हाथी डरपोक है |   इसे पानी में तैरने से डर लगता है |  इसे जाने दो |  लो, तुम चिज्जी खाओ |’  कहकर उसने अंदर से रबड़ी मंगवाई, तो बच्चा मजे से रबड़ी खाने लगा |  बोला -‘ठीक है हाथी, अब तुम जाओ |  मुझे भी घर जाना है |

राजा कृष्णदेव राय मुस्कुराते हुए बोले -‘ कुछ भी हो तेनालीराम,  उस नन्हे बच्चे की बातों का कोई जवाब नहीं !  जरूर तुमने ही उसे सिखाया होगा ?’
-‘हाँ महाराज, मैं भी तो एक चंचल बच्चा ही हूँ न !  तभी तो आपको राज-काज की चिंताओं के बीच खुश रखता हूँ और हंसाता रहता हूँ | सुनकर  राजा कृष्णदेव राय और दरबारी हंसने लगे |  साथ ही तेनालीराम भी हंस रहा था |

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