परमात्मा, ईश्वर या भगवान कौन है ?

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यह एक विषय है, जिस पर कई भी चर्चा करना नादानी मात्र है | परमात्मा हमारी
जानकारी से बहुत ऊपर है |  उसका क्या रूप है ? कहाँ विराजमान है ? कैसे, क्या करता है ?  कैसे संसार को चलाता है ? कैसे पाप-पुण्य का हिसाब रखता है ?  कितने समय से है ?  इस तरह की बातं की जानकारी करने का प्रयास करना मात्र अपने आपको उलझन में डालने के सिवाय कुछ भी नहीं है | …और किसी और  की राय इस दिशा में मान लेना, उससे भी बड़ा भटकाव का रास्ता है |  हाँ, यह पक्की तरह से कहा जा सकता है कि वह जो भी है, जैसा भी है, एक ही हो सकता है | वह एक से ज्यादा हो ही नहीं सकता | इसके अलावा हम जितनी भी कल्पनाएँ कर रहे हैं, वे सब निराधार हैं | वह हमारे अधिकार क्षेत्र से बाहर की चीज़ है | उल्टा यह हो रहा है कि परमात्मा को जानने का प्रयास करने से हम दिशा-हीन हो रहे हैं | हमको अपने बारे में जानने की ज़रूरत है और बहुत ज्यादा ज़रूरत है, सतत ज़रूरत है, जितना जानते जाएँ, उससे और अधिक नया जानने की ज़रूरत है | सारे प्रयासों को हम इसी पर लगा दें, तो बहुत श्रेष्ठ हो जाएगा |

हमें जो भी करना है, अपने ऊपर करना है | अपनी शक्ति को पहचानना है, उसका संवर्द्धन करना है और उसका सदुपयोग करना है | कुछ सृजन करना है, अपने आपको बदलते हूए श्रेष्ठ बनाना है | हम सारे ध्यान को इसी दिशा में केन्र्दित कर, कुछ करें तो बहुत अनूठा घटित हो सकता है | जिन बातों पर हमें कुछ नहीं करना है या कुछ नहीं कर सकते हैं, उनको जानने के प्रयास में ही सारा जीवन गुज़ार देते हैं |  परमात्मा ने हमें जो इतना अतुल भण्डार दे रखा है, उसको जानने में समय खर्च करें, तो हन बहुत कुछ करने योग्य बन जाएँगें | यह नास्तिक बात नही है |   परमात्मा है और उसकी कृपा की बरसात लगातार हम पर जारी है | हम यहाँ तक  की बात जान और मान सकते हैं | इससे आगे परमात्मा की खोज करना या उसके बारे में बहुत गहराई तक जानने की कोशिश करना न तो सम्भव है और न उसकी आवश्यकता है | हम हमारे बराबर या हमारे नीचे के स्तर तक की बात जान सकते हैं, लेकिन जो हमारी हस्ती से बहुत ऊपर की बात है, उसको जानना हमारे वश में नहीं है | जहाँ हमारी सारी  समझ, सारा विश्लेषण, सारे तर्क समाप्त हो जाते हैं, वहाँ  से परमात्मा की शुरूआत होती है, इसलिए परमात्मा के बारे में हम कहने के लायक बिल्कुल भी नहीं हैं,  फिर भी कोई इस दिशा मे प्रयास करता है, तो वह स्वयं को और दूसरों को मात्र धोखा देता है |

परमात्मा है भी या नहीं ?  यह भी सवाल किसी के मन में पैदा हो सकता है | इसका भी प्रमाण तो कोई नहीं दे पाएगा, लेकिन एक बहुत दिलचस्प  बात है कि जब इन्सान यह मानता है कि परमात्मा है, उसकी हम पर बहुत कृपा है, हम परमात्मा के बच्चे हैं, हम केवल एक पात्र हैं, जो अपना रोल कर रहे हैं, सब कुछ उसके निर्देश से चल रहा है, तो वह बड़ा आनन्दित रहता है, निर्भार रहता है, निडर रहता है, निरअहंकारित रहता है |  …लेकिन जब-जब वह इस बात को विस्मृत कर देता है, वह दु:खों के साये में डूबता चला जाता है, जीवन एक बझ लगने लगता है, अहंकार जीवन के आनन्द को समाप्त करने लगता है | हमने परमात्मा और अपने बीच में इतने लोगों को डाल रखा है कि उनको मानने में व्यस्त हो जाते हैं  और परमात्मा को भूल जाते हैं | यहाँ बात समझने की है | हमने बहुत खूबसूरत कहानियाँ बना रखी हैं कि परमात्मा  विभिन्न रूपों में हमारे सामने आता है | हम कुछ लोगों को ही परमात्मा का  अंश मान लेते हैं | विभिन्न तरह की आकांक्षाएँ मन में जगा लेते हैं | हम खुद परमात्मा से मिलने की, परमात्मा के साक्षात दर्शन करने की, परमात्मा से साक्षात आशीर्वाद लेने की चाहत नें, उसका स्वरूप निर्धारित कर लेते हैं | क्या दुनिया में कोई भी ऐसा इन्सान है, जो भौतिक रूप से परमात्मा से मिला है ?  और यदि कोई यह बात कहता है, तो क्या उसकी सत्यता की कोई कसौटी है ?  जो सत्य है वह सत्य है | सत्य को स्वीकार करने में संकोच नहीं होना चाहिए |  हम परमात्मा को मान सकते हैं, जान नहीं सकते | हम परमात्मा को महसूस कर सकते हैं, देख नहीं सकते  | हमारा कल्याण भी मानने से होगा, जानने से नह़ीं | हम परमात्मा की रचना को देख सकते हैं, परमात्मा को नहीं | हम उसकी भौतिक रचनाओं को भी देख सकते हैं और भावों को भी देख सकते हैं | इस जगत में जो एक से बढ़कर एक भौतिक रचनाएँ हैं, उनको इस भाव से देखें कि यह परमात्मा की रचनाएँ हैं, तो हमें वे  अनगिनत रूप से सुन्दर दिखाई देंगी | इसी तरह से उसके द्वारा रची हुई भाव-दशाओं को देखेंगे, तो हमारी सारी परेशानी हट जाएगी |

जो स्वयं को परमात्मा बताते हैं इसके पीछे क्या वजह  है ? या तो वे अपने आपको सत्य के इतना निकट महसूस करते हैं कि उनको ऐसा भ्रम होने लगता हो या वे ऐसी कल्पनाओं में खो जाते हों या लोग उनकी बातें ऐसे नहीं सुनते और मानते नज़र आते हों, तो अपनी बात पर मोहर लगाने के लिए उनको अपने आपको  परमात्मा  कहना पड़ता  हो या फिर जानबूझकर वे अपना प्रभाव जमाने के लिए यह हरकत करते हों !  परमात्मा इन्सान बनकर हमारे सामने आएगा, इस चाहत को त्याग देने में ही हम ज़्यादा सुरक्षित हैं |

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