थम कर चलना

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छोटी-सी बच्ची पिंकी, आज बहुत खुश है |  क्योंकि हर साल की तरह आज भी वह अपने बाबोसा (पिताजी) के संग पुष्कर मेले में जाने के लिए तैयार हो रही है |  असल में, पिंकी ‘नट’ समुदाय से सम्बन्ध  रखती है, जिनकी रोज़ी-रोटी नगर-नगर घूम, करतब दिखाकर चलती है |  इसलिए मेले में जाकर अपने पिताजी को करतब करते देखना तो सिर्फ एक बहाना है |  असल में पिंकी को तो वहाँ की चकाचौंध, छोटे-बड़े फुग्गे, रंग-बिरंगी चूड़ियाँ, अनेक तरह के खिलौने और अपने पसंदीदा गोल-गप्पे – इन सबका मजा अपन बाबोसा के संग में लेना है |

पर शायद उसके बाबोसा के मन में कुछ और ही बात चल रही है |  मेले में पहुँचने से कुछ दूरी पहले ही बाबोसा के कदम रुक जाते हैं |  वे अपनी बेटी को समझाते हुए कहते हैं, ‘देख लाडो, मुझे बहुत ज़रूरी काम के चलते थोड़े दिनों के लिए शहर जाना पड़ रहा है |  तो मैं थारे संग मेले में न आ पाऊँगा |  इसलिए तुझे अपने भाईसा (बड़े भाई) के साथ ही मेले में जाना होगा |  साथ ही, रज्जु (रस्सी) पर करतब भी करने होंगे ‘ |

यह सुनना था कि पिंकी की छोटी-सी  आँखों से बड़े-बड़े आँसू गिरने लगे |  फफकते हुए बोली -‘बाबोसा, मैं अकेले न जाऊँगी मेले में |  और कोई करतब-वरतब भी नहीं करने मुझे |’   बाबोसा घुटने के बल बैठते हुए बोले -‘देख लाडो, अब तू बड़ी हो गई है | सो अब थारी बारी है |  वैसे भी तूने मुझे कई बार करतब करते देखा है |   और मेरे साथ भी तो करतब किए हैं |  अब मैं चाहता हूँ कि तू सबसे चोखी रज्जु-नर्तकी बने |  तो अब ज़िद्द न कर, जल्दी चल |  मुझे जाने में देरी हो रही है |’

ऐसा सुनकर पिंकी अपने आँसू पोंछते हुए बोली -‘पर बाबोसा, मैं कैसे करूँगी करतब ? मुझे तो ढ़ग से ज़मीन पर भी चलना नहीं आता है |  आप मुझे हवा में कसी रज्जु पर करतब करने को कह रहे हो !  आप ही बताओ बाबोसा, भला ये सब मैं कैसे करूँगी ?’

‘पगली ! बस संभलकर कदम आगे बढ़ाना |  बिल्कुल भी डरना मत |  कभी जो थारे कदम डगमगाएँ, तो बाँस के डंडे का संबलले लेना |  संतुलन खुद-ब-खुद वापिस लौट आवेगा |  आसपास के शोर की तरफ़ तो बिल्कुल भी ध्यान मत देना |  बस ‘थम’ कर चलना, सब सही होगा |  देखना, पलक झपकते ही तू एक छोर से दूसरे छोर पहुँच जावेगी | ‘  ऐसा समझाकर बाबोसा वहाँ से चल दिए |

बाबोसा का ‘थम ‘ का अर्थ ‘रुक-रुक ‘ कर चलना नहीं है, अपितु सहारा लेकर चलने और बढ़ने की तरफ है |  शब्दकोष के अनुसार ‘थम’ शब्द के दो अर्थ होते हैं | एक ‘विश्राम लेना’ और दूसरा ‘ आधार’ |  जिस प्रकार बाबोसा अपनी लाडो को एहतियात बरतने हेतु कहते हैं  कि तुम अपने डगमगाते कदमों को ‘बाँस के डंडे’ काआधार देना –  ठीक इसी तरह गुरू भी आपके साथ हमेशा होते हैं, बाँस के डंडे की तरह |

सत्य के मार्ग पर सतत चलना, न कि रुक जाना – नि:संदेह यही समय की पुकार है | पर ऐसे में बहुत स्वभाविक है कि हम सबको तरह-तरह की भ्रांतियाँ और घबराहट के बादल घेर लें |  हम असमंजस में पड़ जाएँ कि हम इस मार्ग के लायक भी हैं कि नही ! क्या हम मार्ग पर आगे बढ़ भी सकेंगे ?  संघर्षों और परीक्षाओं के समय मे भी टिक पाएँगे ?  ठीक वैसे ही, पिंकी भी उलझन में थी कि क्या वह रस्सी पर करतब कर भी पाएगी !

तो ऐसे में, हमें भी पिंकी की ही तरह अपने पिताजी अर्थात् अपने गुरू की सलाह माननी चाहए |  बाहरी एवं आंतरिक परेशानियों से बिना डरे अपने कदमों को आगे बढ़ाना चाहिए | पर ऐसा करते हुए, मन के संतुलन को बिगड़ने से बचाने के लिए, साधना रूपी बाँस के डंडे का प्रयोग भी करना चाहिए | साधना से जुड़ते ही आस-पास का शोर रूक जाता है और मन नियंत्रित हो जाता है |  फ़िर मंजिल तक पहुँचने में देर नहीं लगती |

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