जागरण – भीतर के द्रष्टा को जगाना

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 यह जीवन जीने की सबसे महत्वपूर्ण कला है | एक द्रष्टा की भाँति अपने आपको देखो | यह एक मूलमंत्र है | जिस दिन हमें यह कला आ जाएगी, हमें सब कुछ मिल जाएगा | जितने भी अध्यात्म के मार्ग हमें जीवन में बताए गए हैं, सबका एक ही ध्येय है – हमारे भीतर के द्रष्टा को जगाना | रास्ता कोई भी हो, चाहे मन्दिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरूद्वारा जाने की बात हो, चाहे ध्यान, सत्संग, कथा, कीर्तन, भजन की बात हो, चाहे योग, तप, साधना की बात हो, सबका अन्तिम लक्ष्य है – जागरण ! यदि सब कुछ करके भी जागरण पैदा नहीं हुआ, तो सारी गतिविधियाँ व्यर्थ हैं और कुछ भी किए बिना भी यदि जागरण आ गया, तो समझ लो सब कुछ उपलब्ध हो गया |

निश्चित रूप से ये क्रियाएँ जागरण के लिए अत्यन्त सहयोगी हो सकती हैं | यह भी
कह सकते हैं कि जागरण इनमें से कोई क्रिया के बिना सम्भव नहीं है | …लेकिन
क्रिया करने के साथ उसका उद्येश्य तो पता होना चाहिए अन्यथा उसका कुछ लाभ
नहीं मिलने वाला | हम केवल क्रिया को ही महत्व देने लग जाते हैं | क्रिया को ही
अन्तिम मंजिल मान लेते हैं | ये तो रास्ते हैं और  रास्ते पर चलते हुए यदि यह पता
ही नहीं हो कि जाना कहाँ है, तो ज़िन्दगी भर चलते ही रहेंगे, मंज़िल नहीं मिलेगी |
एक व्यक्ति तेज़-तेज़ कहीं जा रहा था | किसी ने उससे पूछा कहाँ जा रहे हो ? उसने जवाब दिया मुझे ज्ञान की तलाश है , उसे ढूँढ़ने जा रहा हूँ | ज्ञान उसके बेटे का नाम था | …लेकिन  पूछने वाले ने समझा कुछ जानने के लिए जा रहा है | उसकी भी उत्सुकता बढ़ी, वह भी उसके साथ लग गया | थोड़ी देर उसके साथ चलता रहा |  बाद में उसको थकान महसूस होने लगी, तो वह वापस आ गया, लेकिन जिसको बेटे की तलाश थी वह चलता रहा | सवेरे उस व्यक्ति को वापस उसने देखा, तो पुन: पूछा कि क्या तुम्हें ज्ञान मिल गया ?
उसने कहा हाँ मिल गया |  पीछे वाली पहाड़ी के ऊपर पीपल का पेड़ है, वहीं जाकर मिला | उस व्यक्ति के जाते ही, वह दूसरा व्यक्ति उस पहाड़ी की ओर रवाना हो गया |  वह पीपल के पेड़ के नीचे पहुँच गया और वहाँ बैठ गया | उसे बहुत ही सुन्दर अनुभूति हुई, क्योंकि वह ज्ञान के उद्देश्य से वहाँ बैठा था और उसे विश्वास था कि मुझे निश्चित रूपव से यहाँ ज्ञान मिलेगा | उसकी सारी उर्जा सकारात्मक काम कर रही थी | उसे लगा, जैसे जीवन में सबसे सुन्दर घड़ी आज मिली है | वह बड़ा आनन्दित हुआ |

उसने गाँव में आकर अपने दोस्तों को यह बात बताई | दोस्त भी वहाँ गए, लेकिन
उन्हें ज्ञान की ऐसी कोई प्यास नहीं थी | वे तो बस यों ही देखने गए थे कि देखते हैं क्या होता है |  उनको कुछ अलग महसूस नहीं हुआ | …लेकिन उन्होंने यों ही बात को फ़ैला दिया कि पीछे वाली पहाड़ी पर पीपल के पेड़ के नीचे जाने से बड़ा धर्म-लाभ होता है | धीरे-धीरे तो वहाँ बड़ा स्थान बन गया | लोगों ने बड़ी-बड़ी धर्मशालाएँ बना दी | आस-पास के गाँव वाले आने लगे | दूर-दूर से लोग आने लगे | पता नहीं क्या-क्या बातें  फ़ैल गईं | वहाँ तो देवता का वरदान है, बीमारियाँ ठीक हो जाती हैं | नहीं जाओ तो पाप लगता है | लोग रूपया-पैसा चढ़ाने लगे | वहाँ खूब पैसा आने लगा | बहुत कुछ हो गया, लेकिन जो अनुभूति उस व्यक्ति को हुई थी, वैसी किसी को नहीं हुई |  अपने वहाँ जाने का जो उद्देश्य उसने दोस्तों को बताया था, वह पता नहीं किस रूप में तब्दील हो गया |

यह हमारे साथ रोज़ हो रहा है | हम भीड़ में शामिल होकर बहे जा रहे हैं |  कुछ पता नहीं है क्यों जा रहे हैं | सब कर रहे हैं, इसलिए हम भी कर रहे हैं | बस किए जा रहे  हैं | किस दिशा में बड़े जा रहे हैं | यह पता ही नहीं कि क्यों जा रहे हैं | धन कमाने में लगे हुए  हैं | जितना कमाते हैं, उससे और अधिक कमाने की प्यास बढ़ती जाती है | कभी-कभी यही पता नहीं होता कि क्यों कमा रहे हैं | इससे यह होता है, कि धन तो मिल जाता है, पर आनन्द नहीं मिल पाता | इसे जागरण नहीं कहते हैं, इसे बेहशी कहते हैं | एक ही कृति के परिणाम अलग-अलग हो सकते हैं | आप ध्यान कर रहे हैं | आपको पता है कि इसकी परिणति जागरण है,  तो आपको ध्यान का लाभ मिलेगा | दूसरा ध्यान कर रहा है, लेकिन वह सिर्फ़ इसलिए कर रहा है कि दूसरे कर रहे हैं, तो उसे  कुछ भी लाभ नहीं मिलने वाला |  किसके लिए कौन-सा रास्ता सार्थक है, यह भी स्वयं को खोजना होगा | यह दूसरों की नक़ल करने का मामला नहीं है | कुछ क्रियाओं को सामाजिक मान्यता दे दी जाती है | सबको उनको करने के लिए बाध्य किया जाता है | नहीं करने वालों पर दबाव बनाया जाता है | उन्हें ग़लत समझा जाता है | जबकि बिना इच्छा के कोई भी क्रिया करने का कोई लाभ मिल ही नहीं सकता | किसी में प्यास जगाई जा सकती है | अपना अनुभव बताया जा सकता है, पर अनुभव थोपना कदापि उचित नहीं है | जागरण पूरा अन्तर्जगत का मामला है | यह दबाव का मामला नहीं है | दबाव से आप शरीर को ले जा सकते हैं मन को नहीं | पर यह निश्चित है कि जागरण बिना जीवन में अध्यात्म की शुरूआत नहीं हो सकती है |  सिर्फ़ अध्यात्म ही नहीं, जागरण बिना जीवन में कुछ भी सार्थक नहीं हो सकता | आदतें जागरण की विपरीत अवस्था है | बिना होश के आदतों के फ़लस्वरूप मनुष्य बहुत सारी गतिविधियाँ करता रहता है और जीवन भर अपनी ही गतिविधियों पर पश्चाताप  करता रहता है | वह बार-बार निश्चय करता है कि मुझे अब क्रोध नहीं करना है, ग़लत शब्द नहीं बोलने हैं, लालच नहीं करना है, कोई बुरा काम नहीं करना है आदि-आदि, पर उससे होता कुछ भी नहीं है | जब वह बार-बार निश्चय करके भी कुछ कर नहीं पाता है, तो धीरे-धीरे उसका आत्म-विश्वास कमज़ोर होता जाता है, वह अपने आपको हीन समझने लगता है | यही कारण है कि मनुष्य की आयु ज्यों-ज्यों बढ़ती है, उसके जीवन में आनन्द कम होता जाता है और वृद्धावस्था तक पहुँचते-पहुँचते वह पूर्णता आनन्द-विहिन हो जाता है |

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