अपनी बीमारी की अच्छी तरह जाँच कर लो, फिर उसका इलाज भी हो जाता है| जो बीमारी अपनी को समझता नहीं, वो दुरस्ती कैसे कर सकता है| इस बीमारी में सब शरीरधारी खड़े हैं| तुम सबसे पहले ईश्वर विश्वासी बनो| बच्चों वाले विचार छौड़ नेक अमल सत् कर्म धारण करें| जिन कर्मों से मन की अशांति बढ़ती है, उनको छौड़ दें| इस मनुष्य देह का असली मकसद जानें| जब जान लोगे तब कहीं सही सोच वाले बनोगे | इस मनुष्य देह को धारकर सिर्फ भोग प्राप्ति के वास्ते यत्न करते रहना ये सही यत्न नहीं है| इस जामे की विशेषता ये ही है कि अपने आपकी पहचान करें| ये जाने कि कहाँ से आया है? किधर जाना है? और क्या कर रहा है? ईश्वर क्या है? और संसार क्या है? आत्मा क्या है? जिस्म क्या है? आत्मा शरीर का संबंध कितनी देर चलेगा? अंतर विखे जो वासना उमड़ रही है, ये किधर ले जा रही है? इसकी निवृति कैसे होगी?

प्रेमी, बहुत से विचार सोचने समझने हैं| पहले क,ख पढ़ो | मतलब सादगी धारण करो| सत्य बोलो, सेवा करो, सत्संग में आया करो| फिर आहिस्ता-आहिस्ता गुरू पीर अवतार का आधार पकड़ो| शरीेर कुंडा चाहिए| आलस्य छौड़कर सत् पुरूषार्थ धारण करो| इसकी कल्याण एक दो बातों से नहीं हो जाती | इसके सुधार के वास्ते बड़े दिल की ज़रूरत है| ये मन सांसारिक सुखों की तरफ जल्दी दौड़ता है| जो बात मन में पक्की हो जाती है, उधर ही बुद्धि , शरीर भी लग जाते हैं|
चोर, कुत्तिया मिल गए, पहरा किसका दे| हर वक्त कल्याण के वास्ते सोचते रहो| अंतर विखे जो चोर बैठे हुए हैं| पलक-पलक विखे इनसे बचाव करना है| बार-बार सोचो, ये जिंदगी किस वास्ते मिली हुई है| बगैर ईश्वर की खोज के ममता का गुबार खत्म नहीं हो सकता| इस संसार की अश्चर्ज रचना से आबूर पाना कोई आसान नहीं| जिन्होंने अपने आप पर काबू पा लिया है| उनकी नज़दीकी हासिल करो | तब ही तृष्णा रूपी नदी को पार कर सकोगे| इतनी बातें समझाने वाला कोई मुश्किल से ही मिलेगा| ईश्वर नित सत्य है| संसार नित झूठ और दु:ख रूप है|
बुलिया शाह इनायत मुर्शिद मिलिया, तब जाना इल्म है| होना ना होना सब प्रभु आज्ञा में जानो
ईश्वर विश्वास ही आधार है
योग मार्ग का -~-:
सब काम विश्वास की दृढ़ता से पूरे होते आए हैं| ईश्वर का विश्वास बड़ी चीज़ है| सब ज्ञान ध्यान तेज बल ईश्वर विश्वास से प्राप्त होता है| ईश्वर विश्वास रखने वाला ही हर बात में विजय हासिल कर सकता है| ईश्वर विश्वास ही असली परम तृप्त है| बाकि सारा संसार ही अतृप्त, अशांत, दु:ख में है| जो धीरज ईश्वर के अंदर आता है, उसकी महिमा कौन बखान कर सकता है| सम तत् जानने वाला ही प्रभु विश्वासी है| उसने ही परम प्रसन्नता को प्राप्त किया हुआ है| जिसके अंदर जात वाहद का यकीन आ जाए, उसे फिर किसी के आधार की जरूरत नहीं रहती| सब रिद्ध-सिद्ध ईश्वरी विश्वास रखने वाले को हासिल होती है| ईश्वरी विश्वासी बड़ी से बड़ी कु्र्बानी देने वाला होता है| बगैर सत् विश्वास के भूत-प्रेत वाला जीवन है| विश्वास हीन लोक परलोक में शान्ति नहीं पा सकता | ईश्वर चरणों का विश्वास ही अनुराग पैदा करता है| जब संसार से वैराग्य होगा, ईश्वर अनुराग आ जावेगा| एक विश्वास सब गुण की खान,
मंगत दृढ़ विश्वासी को मिल भगवान|
योग की विद्या को हासिल करने के वास्ते बड़ी विशाल बुद्धि की जरूरत है| बिना गुरू के न साधना मिलती है और न बगैर साधना के धीरज आता है| बल्कि और शरीरों को धारण करके जीव भ्रम में ही यात्रा को खत्म कर देता है| संसार में सबसे बड़ा मित्र गुरू ही है जो शिष्य से किसी स्वार्थ की कामना रखते हुए हर समय शिष्य की आत्मिक उन्नति का चाहतक होता है और जिज्ञासु को निष्काम भाव धारण करने की तलकीन करता रहता है|
संसार में जो भी शरीरधारी आया है अपनी कमी को पूरा करने के यत्न में लगा है, लेकिन बावजूद यत्न प्रयत्न के ये कमी पूरी ऩही होती| गुरू ही इस कमी को पूरा करने के साधन बतलाते हैं| कोई तो इस कमी को शीघ्र ही पूरा कर लेते हैं| कोई सारा जीवन लगा देने पर भी इसे पूरा नहीं कर सकते| ये सब अपने सत् पुरूषार्थ पर मनहसर हैं| पहले शिष्य को चाहिए तन-मन-धन सब गुरू के अर्पण कर देवें|
अपना कुछ भी न जानते हुए जीवन निर्वाह करते हुए लोक सेवा में हर तरह से तन-मन-धन को लगाए रखें | लेकिन जो सही गुरू है वो शिष्य का कुछ न लेते हुए उसे परउपकार में अर्पण करने की तलकीन करते हैं| ऐसे गुरू संसार में मिलने मुश्किल हैं| गो शिष्य होना भी कठिन है क्योंकि अदृष्ट वस्तु से मेल करना है| इसमें अधिक श्रद्धा और विश्वास की ज़रूरत है|
शिष्य को चाहिए कि गुरूदरबार में हाज़िर होकर पहले अपने मन के संशों को दूर करे, फिर योग साधना के लिए प्रार्थना करे| ये सस्ता सौदा नहीं कि बुला-बुलाकर उपदेश दे दिया जावे| भले ही कोई शिष्य बार-बार प्रार्थना करे| मगर सद्गुरू शिष्य की श्रद्धा को देखते हैं तब जाकर कृपा करते हैं| कलयुगी जीवों के दिल मजबूत नहीं होते| इस वास्ते घरों में आकर चिताना पड़ गया है इनको तुम लोगों ने क्या देना है|
ये फ़कीर किसी अपनी गर्ज के वास्ते तुम्हारे दरवाजों पर नहीं आए, बल्कि इसलिए कि शायद कोई पारखू जीव मिल जाए|
आत्म आनन्द में रते हुए पुरूष इस तरह कब अपनी जगह से हिलते हैं| लेकिन साहिब का हुक्म जबरदस्त है| वेद ग्रन्थों की सार निकालकर रख रहे हैं, फिर भी विश्वास न आए तो तुम्हारी किस्मत|

Leave a Reply