गुरू का उपदेश

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ईश्वर की उपासना कई निश्चय करके संसारिक जीव करते हैं| पहले जीव जड़ बुद्धि वाले मूर्ख लोग वे हैं, जिन्होंने परमेश्वर के मुतल्लक सुना है, मगर अन्दर विश्वास नहीं है| वो अपनी नेकी, बदी को सोच नहीं सकते हैं| इनकी ज़मीर अन्धी और मोटी होती है| वो किसी वक्त कहीं मुहँ से परमेश्वर का नाम किसी पीर गुरू से सुनके निकालते हैं| मगर पता नहीं है कि परमेश्वर क्या चीज़ है | उन्होंने जिन्दगी का मुद्धा यह समझ रखा है कि खूब ऐशो इशरत की जावे | सत-असत कर्म करके मन और इन्द्रियों के भोगों में गर्क रहना जिन्दगी का मिशन समझा है| ऐसे लोग हर किस्म की चाल चलने वाले होते हैं|

अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के वास्ते अपनी लड़कियाँ तक बेचकर अपना लालच पूरा कर लेते हैं, इनको लज्या, शर्म, गैरत नहीं होती| वो मन के दोषों में ऐसे गिरफ़तार हैं कि हर वक्त दुराचार करके इनको निवृत करने की कोशिश करते हैं| जब दुराचार करके चलते हैं, कहते हैं हम सफेदपोश हैं| हमने कोई गुनाह नहीं किया| ऐसी सीरत वालों को चन्डाल का दर्जा दिया गया है| ऐसे लोग हमेशा बेवफा होते हैं|

किसी से हमदर्दी वाले नहीं होते| साक्षात राक्षसी बुद्धि वाले पुरूष हैं| इनका कोई इलाज़ नहीं| इनका मर्ज लाइलाज़ है| इनका कोई गुरू पीर नहीँ| गवर्नमैन्ट ही इनको कोई दण्ड दे तो दे या कुदरत कर्म दण्ड दे सकती है| दूसरे दर्जे के जीव वे हैं जिन्होंने रब के मुतल्लक सुना है | वो ईश्वर को जानते हैं मगर इसलिए कि संसार के सुख और सम्पदा मिले, धन मिले व स्वार्थ की खातिर रब को याद भी करते हैं | दो चार साल भजन बन्दगी भी करते हैं | अगर संसार का सुख होने लगा तो उनकी रुह इस तरफ लगी रहती है और अगर संसार की गर्दिश आ गई तो भजन बन्दगी छोड़ देते हैं और कहते हैं कि हमें भजन बन्दगी से क्या मिला जो लोग बुरे काम करते हैं और धोखे करते हैं वे फल फूल रहे हैं, लेकिन जो अच्छे काम करते हैं भजन भी करते हैं फिर भी दुखी हैं| इनके ऊपर पंडित काज़ी, मुल्ला हैं| वो दिखावे की खातिर माला फेरते हैं ताकि लोग उनपर ऐतबार करें और वो अपना उल्लू सीधा करें| बड़े – बड़े सजदे करते हैं | मन्दिरों में बड़ी- बड़ी आरतियाँ करते हैं| जनैऊ वगैरा खूब पहनते हैं| ज़रा सा कपड़ा किसी से छू गया फौरन स्नान करते और कपड़े धोते हैं| लकडियाँ तक वो धोकर जलाते हैं| मगर जानवरों को पर व बाल सहित हड़प जाते हैं| ये सब धर्म के ज़रिए संसारी सुख एकत्र करते हैं, इस तरीके से रब के ज़रिए संसारिक सुख एकत्र करते हैं, इस तरीके से रब के मानने वाले दरअसल रब को नहीं मानते, वोह माया के मोह में जकडे़ हुए हैं |

 

रब के मानने वाले वो हैं जिन्होंने संसार की नाशवान हालत का विचार किया और सोचा कि संसारी सुख खत्म हो जाएँगें| उन्होंने सोचा मन को ऐसी जगह लगाया जावे जहाँ सच्चा सुख हासिल हो| वो शार रिक सुख की खातिर ईश्वर को नहीं मानते, बल्कि मन की शान्ति की खातिर उसका सिमरण करते हैं| उनकी भक्ति अटूट होती है| वो रब से व्योहार नहीं करते| सुख और दुख में ईश्वर को याद करते हैं| वे दिखावे की खातिर ईश्वर को याद करते हैं| बल्कि वे इरादे को पुख्ता करने की खातिर रब को याद करते हैं| वे चाहते हैं कि उनकी जिन्दगी जनता की बेहतरी के लिए सिर्फ़ हो| ऐसे पुरूष ईश्वर महिमा को जानने वाले हैं| लोक सेवा का भाव उनके अन्दर पैदा होता है| दूसरों का दु:ख जानते हैं| वे निष्काम सेवा करते हैं| वे ईश्वर वादी पुरूष हैं| जनता की सेवा जनार्दन की सेवा उनका असूल है| वे ईश्वरवादी पुरूष हैं| जिस पुरूष में जनता का प्रेम और सेवा को वो ईश्वर को मानने वाला है| गुरूओं ने सही रास्ता बतलाया और खुद उस रास्ते पर चलकर कामयाबी हासिल करके जनता को रास्ता दिखलाया और उन्होनें बतलाया कि ईश्वर को वह समझ सकता है जिसके अन्दर खलकत का प्रेम है| हर एक जीव चाहता है कि मुझ को दु:ख न मिले| इसलिए उन्होनें बतलाया कि अगर तू सुख चाहता है तो सब जीवों को सुख देने वाला बन| अपना सुख दूसरों में तक्सीम कर| तुझे खुद ब खुद सुख मिलेगा| अगर तू ऐसा बनेगा, दुनिया में नाम रोशन होगा| अपनी रोटी में से अतिथि, अभ्यागत, यतीम, अनाथों को दे| तेरे अम्बार भरे रहेगें| तुम्हारा भला दूसरों के भले में है| ऐ मानुष तेरी कल्याण में है| अगर तू दूसरे से दुश्मनी करेगा, तू अपने से दुश्मनी करेगा| लेकिन ये ऊँची तालीम है| इसकी समझ मुश्किल है| कुलक्षण रूप बुद्धि दुसरों के दोष तलाश करके अपने अन्दर दोष भर लेते हैं| अपने अन्दर बेएतबारी है, इसलिए दूसरों को बेएतबार समझता है| नेक स्वभाव फरमाबरदारी, सेवा, सत्य वगैरा धर्म के रूप हैं| कानून कुदरत के मुताबिक चलने वाले लोग कामयाब होते हैं| मन्दिर वगैरा संगत के इकट्ठा होने के वास्ते बनाए गए हैं, ताकि वहाँ जाकर नेक अमल सीखें| जो पुरूष अपने शशीर की ताकत व धन दूसरों की भला ई की खातिर सरफ करता है, वो दिल का मालिक बन जाएगा| दिल के मालिक नेक स्वभाव वाले बनते हैं| जिनके अन्दर जनता की प्रीत, जनता की सेवा, और उपकार नहीं, उनको रब का पता नहीं है| महापुरूष सोचते हैं कि जैसे अपने बच्चे वैसे दूसरों के बच्चे है| वे उनकी भी सेवा करते हैं|

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