सौंदर्य और शौर्य की प्रतीक – वीर गुजरी

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सौंदर्य और शौर्य की प्रतीक – वीर गुजरी
दादी माँ के मुख से

पहाडियों के प्राकृतिक परकोटों से फैला हुआ घना जंगल और कल-कल बहती हुई राई नदी |  पास ही बसी थी गूजरों की बस्ती |

ग्वालियर के राजा मानसिंह ने इसी जंगल के ऐक पेड़ पर शेर के शिकार के लिए मचान बनाया था |  ढोल-नगाड़े बजाते हरकारे हांक लगाकर थक चुके थे, पर जंगल का राजा शेर अभी तक नहीं आया था |  ग्वालियर नरेश बहुत परेशान थे |  तभी एक ग्रामीण युवती को देखकर वह चौंक पड़े, भैंसे को वह ऐसे खींचकर ले जा रही थी, मानो भैंसा नहीं, कोई बकरी हो |

मचान पर बैठे सुंदर युवक को देखकर वह कटाक्ष से बोली -‘पेड़ पर बैठकर शिकार करोगे ?  क्या कहने तुम्हारी बहादुरी के |
युवक ने मुस्कराते हुए कहा -‘मैं शेर का शिकार करने आया हूँ |
गुजरी बोली -‘असली शिकारी वही है, जो आमने-सामने खड़े होकर शिकार करे |’
अगले दिन मचान के नीचे बछड़े की गंध सूंघता हुआ शेर उसकी ओर बढ़ता दिखाई देने लगा |  राजा ने धनुष पर तीर चढ़ा लिया | तभी उसे पीछे से आती गुजरी दिखाई दी |  गुजरी ने हाथ हिलाकर  राजा को तीर न चलाने का संकेत दिया |  उसने पूरे हाथ में कपड़ा लपेटा हुआ था  और एक लोटा पकड़ा हुआ था | गुजरी के पैरों की आहट सुनकर शेर ने पीछे मुड़कर देखा और जोर से दहाड़ा | तभी गुजरी ने अपना कपड़ा लिपटा हुआ हाथ लोटे सहित शेर के मुंह में घुसा दिया |  शेर की सांस रुक गई और वह थोड़ी देर में ही छटपटाकर जमीन पर गिर पड़ा |

राजा मानसिंह उस युवती के अद्भुत पराक्रम और सौंदर्य से चकित हो गए |  उन्होंने गुजरी को अपनी रानी बनाने का निश्चय किया |  हिरन जैसी बड़ी-बड़ी आंखों वाली उस युवती को उन्होंने नाम दिया – मृगनयनी |   राजा ने जब मृगनयनी से विवाह का प्रस्ताव रखा, तो मृगनयनी ने कुछ शर्तें रखी -‘मेरी पहली शर्त है-मैं आपके साथ तब तक ही रहूंगी, जब आप मेरे लिए एक अलग महल बनवाएंगे और मेरे गाँव की राई नदी को महल तक लाएंगे, क्योंकि मैं राई नदी का पानी ही पीती हूँ |  दूसरी शर्त -आप मुझे कभी शिकार खेलने से नहीं रोकेंगे |  तीसरी शर्त -मेरी सहेली लखिया मेरे साथ रहेगी |’

राजा मानसिंह ने उसकी सभी शर्तें माब लीं |  उन्होंने उसके लिए गूजरी महल बनवाया और राई नदी से  एक नहर काटकर उसके महल तक लाई गई |  अब जंगल की गुजरी ग्वालियर के राजा मानसिंह की महारानी बन चुकी थी |  एक दिन खबर आई कि दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोदी की सेना ग्वालियर  पर आक्रमण करने के लिए आगरा से कूच कर चुकी है |  मानसिंह अपने सलाहकारों के साथ इस  स्थिति से निपटने के लिए मंत्रणा कर रहे थे |  तभी मृगनयनी ने घोषणा की – ‘महाराज, ग्वालियर की बाहरी सीमािओं पर दुश्मनों को रोकने का जिम्मा मैं स्वयं लूंगी |  सेना मेरे नेतृत्व में दुश्मन की सेना से युद्ध करेगी |  आप नगर की आंतरिक व्यवस्था सुचारू रूप से संभालें |  अगर मुझे मदद की आवश्यकता होगी, तो मैं राई गाँव के टीले पर आग लगाउंगी, जो किले से साफ दिखाई देगी |  तब आप आंतरिक सुरक्षा में लगे सैनिकों की एक टुकड़ी मेरी सहायता के लिए भेज दीजिएगा |  हाँ, युद्ध में मेरी सहायक मेरी सहेली लखिया होगी |

मृगनयनी की बहादुरी का सम्मान करते हुए रसजा मानसिंह ने भारी मन से उसकी बात मान ली |  नगर की सीमा के बाहर शेरों से सामना करने वाली मृगनयनी ने हमलावार सैनिकों को गाजर-मूली की तरह काटना शुरू का दिया |  दो दिन में ही सुल्तान की सेना को पराजित होकरआगरा की ओर भागना पड़ा |  मृगनयनी युद्ध जीत चुकी थी |   राई गांव के टीले पर राजा का ध्वज फहरा रहा था |  जब मृगनयनी नगर में पहुंची, तो नगरवासियों ने फूलों की वर्षा करके उसका भव्य सवागत किया |  राजा मानसिंह की इस वीरांगना रानी जी शौर्यगाथा ग्वालियर के किले में बना गुजरी महल आज भी बड़ी शान से सुनाता है |  सौंदर्य और शौर्य की प्रतीक मृगनयनी भारतीय इतिहास में स्त्री शक्ति की अद्भुत मिसाल है |

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