ईश्वरमय जीवन – जीवन जीने का ढ़ग

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जीवन जीने का ऐसा ढ़ग जिसमें इंसान ईश्वर प्राप्ति के लक्ष्य की ओर निरन्तर आगे बढ़ता जाए |  संसार में जितने भी अवतार हुए हैं, और जिन्हौंने जिस-जिस मज़हब को आगे बढ़ाया है, सबका केवल एक ही मत रहा है कि जो भी धरती पर जन्म लेता है, उसका केवल एक ही लक्ष्य है, ईश्वर की प्राप्ति |  और इस लक्ष्य की प्राप्ति तभी सम्भव है जब उसे अपने अन्दर उस जीवन शक्त का अनुभव हो | वही जीवन शक्ति जो सारे संसार चराचर भूत का आधार है |

लेकिन आज की सोच है कि जिन्दगी मज़े लेने के लिए मिली है |  ज्यादा से ज्यादा खुशियाँ लेने के लिए मिली है, इसलिए मौज़ मस्ती करो |  इसी सोच का एक बढ़िया उदाहरण है, पश्चिमि संस्कृति | मौज़ मस्ती की अधिकता में अधिक सुख है,  ऐसा हरगिज़ नहीं है |  अधिक सुख की लालसा बिल्कुल वैसी है जैसे मरूस्थल में जल को ढ़ूढँना |  जीव के सुख की प्यास कभी खत्म नहीं होती बल्कि उतनी ही ओर बढ़ती जाती है |   सुख की लालसा ऐसी है, जो जितनी पूरी होती है, उतनी ही ओर बढ़ती है, लेकिन तृप्ति नहीं होती |  गहरी बुद्धि वाले लोगों ने बहुत विचार करने के बाद ये नतीज़ा निकाला कि मन की शान्ति अधिक सुखों को इकठ्ठा करने में नहीं है, जबकि अधिक सुखों की प्यास या इच्छा को बढ़ाने वाले हैं, तृप्ति या शान्ति देने वाले नहीं हैं |  इन भोगों को भोगते-भोगते ये शरीर खत्म हो जाता है  लेकिन प्यास या कहो इच्छा कभी खत्म नहीं होती |

ईश्वरमय जीवन का अर्थ है कि हमें यह विश्वास होना चाहिए कि ईश्वर सदैव हमारे साथ है, वह अन्तर्यामी है, वह हमेशा हमारे अंग-संग है | हमारे कर्म हमेशा ऐसे होने चाहिए कि  जिससे कभी किसी का दिल ना दुखे, किसी को बुरा ना लगे |  अगर हमारे जीवन का लक्ष्य है कि हमें उस परमपिता के निकट जाना है, उनका आशीर्वाद पाना है, इस आवागमन से मुक्ति पानी है,  तो हमारे जीवन का हर कर्म उस प्रभु की आराधना के अनुरूप होना चाहिए |  हर चीज़ अपने स्त्रोत
से दूर अपने आपको अपूर्ण, बेसहारा महसूस करती है जैसे ही उसे अपना असली रूप प्राप्त करने का मौका मिलता है वह अपने आधार की तरफ़ जाने का प्रयत्न करती है |  संसार में जितने भी  अवतार, पीर-पैगम्बर, संत, गुरू, फ़कीर, महापुरूष हुए हैं, उन सब ने इसी बात पर ज़ोर दिया है कि ऐ जीव, तेरी ज़िन्दगी का परम लाभ यही है कि परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करने का जतन करना | आत्मबोध से परमात्म बोध हासिल करना | इस महान लक्ष्य की प्राप्ति के लिए दो साधन हैं पवित्र जीवन और ईश्वर प्रेम | इन दोनों  साधनों को साथ-साथ अपनाने हेतु ईश्वरमय जीवन |

एक आम इंसान की सोच यही होती है कि मेरा सारा दिन बहुत ही बीज़ी है,
हर समय चौकस रहना पड़ता है,  जैसे एक फ़ौज़ का सिपाही या अफ़सर या पुलिसमैन  तो मैं किस समय ईश्वर को याद करूँ |  ऐसे हालात में ईश्वरमय जीवन कैसे अपनाया जा सकता है | संतों ने ईश्वर के प्यारों ने इसका हल बताया है कि ईश्वर का हुक्म मानकर पूर्ण ध्यान से अपने फ़र्ज को निभाये | हालात की माँग हो तो शत्रु पर बिजली बनकर गिरे | देश रक्षा के लिए जान की बाजी लगा दें | ईश्वर को हाज़िर-नाज़िर जानते हुए अपने कर्त्तव्य का पालन करें | थोड़ा समय निकालकर अपने प्रभु की आराधना, सिमरण और ध्यान भी करें | ये दलील सिर्फ पुलिसमैन, फ़ौज़ का सिपाही या अफ़सर के लिए ही लागू नहीं होती अपितु बिजली, पानी, टेलीफोन, रेलवे , ट्रान्सपोर्ट, कस्टम, एक्साइज टैक्स, पी. डबल्यू. डी, उद्योग, कृषि, स्वास्थ्य और शिक्षा के विभागों में हों | चित् के अन्दर धारणा यह होनी चाहिए कि जो ज़िम्मेदारी आपको सौंपी गई है उसे ईश्वर आज्ञा मानकर पूरी
ईमानदारी से देश और समाज की सेवा करनी चाहिए | जनता के हित में अधिक से अधिक जतन करना ईश्वरमय जीवन है |

व्यापारी या दुकानदार लोग तो ये महसूस करते हैं कि उनके धन्धें में धर्म और ईमानदारी का रास्ता अपनाना बेहद कठिन है | जो लोग मिलावट करते हैं, कम तोलते हैं, नकली को असली कहकर मुनाफ़ाखोरी करते हैं वो बहुत पैसा बना लेते हैं और सच्चाई और ईमानदारी पर दृढ़ होने वाले पीछे रह जाते हैं |  इस पर संतों का ज़वाब यह है कि  जैसे सफ़ेदे के पेड़ बड़ी जल्दी बड़ते हैं परन्तु जब कोई जोरदार आन्धी तुफ़ान आया तो ये कड़क-कड़क करके गिर जाएँगें | मगर बरगद का छोटा-सा पेड़ ये सही सलामत रहेगा | बहुत शीघ्रता से बढ़ने वाले नापायदार भी हो सकते हैं | झूठ की नींव पर खड़ी हुई दीवार जल्दी गिर भी जाती है |

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