जन्म से ही हर जीवन बाहरमुखी है सब ज्ञानेन्द्रियाँ आँख, जिव्हा, नाक और त्वचा बाहर से एहसासात प्राप्त करते हैं | एक छोटा बच्चा भी मीठी चीज़ को चस्का लगाकर चाटता है, कड़वी को थूक देता है | सुन्दर दृश्य को शौक से देखता है, भयानक से दूर भागता है | बड़ी उमर में ये स्वभाव और भी व्यापक होता है, जबान को स्वादिष्ट खाने, कान को सुन्दर संगीत, नाक को सुखद सुगंधियाँ, त्वचा को सुखद स्पर्श, आँख को रंग-बिरंगे लुभायमान दृश्य मोहित करते हैं |  इस स्वभाव के कारण और कुछ समाज की देखा देखी जीव इन इन्द्रिय भोगों की प्राप्ति के लिए यत्न प्रयत्न में लग जाता है बल्कि ऐसा लगता है कि चौबीस घन्टे इसी धुन में ग्रस्त रहता है कि अधिक से अधिक भग-सामग्री, धन दौलत इकठ्ठा करें अपना और परिवार का जीवन सुखों से भरपूर कर ले | इसी में कई थपेड़े भी पड़ते हैं क्योंकि प्रकृति या माया द्वन्दमयी है | लाभ के साथ हानि  जुड़ी है, प्रकाश के साथ अन्धेरा, चढ़ाव के साथ उतार, सफ़लता के साथ विफलता, तन्दुरूस्ती का साथ रोग, मान के साथ अपमान इत्यादि | फ़िर भी अक्सर लोग बरसों तक या दशकों तक इस रास्ते पर चलते जाते हैं | भोग भोगते-भोगते शरीर के अंग क्षीण हो जाते हैं | शरीर को रोग लग जाते हैं, परन्तु मन की तृप्ति नहीं होती | यह माया जाल है | लोग इस दौड़ से रुककर अपने जीवन की बैलेन्स शीट नहीं बनाते और निराशे और प्यासे ही मौत के कगार पर पहुँच जाते हैं | कुछ ही तीव्र बुद्धि
लोग है जो इस माया के खेल पर गहरी गौर करके सोचते हैं कि इस रास्ते पर चलते हुए और दौड़ते हुए मन की शान्ति प्राप्त नहीं होती | वो समझते हैं कि मन बेअन्त इच्छाओं और वासनाओं का स्रोत्र है | इनमें से कुछ पूर्ण हो जाती है जिससे सुख अनुभव होता है |

अक्सर इच्छायें पूर्ण नहीं होती  जिससे दु:ख होता है और क्रोध आता है | यही नहीं, बल्कि पूर्ण होने वाली वासनाएँ भी सुख नहीं देती | लोभ, मोह और अंहकार को बढ़ा देती है | परिणामस्वरूप संघर्ष, चिन्ता और भय , शौक और मानसिक तनाव जीव को घेरे रहते हैं | बहुत लोग इस भेद को नहीं समझते कि माया के लगाव में अशान्ति ही अशान्ति है और असली सुख और शान्ति आत्म परायण होने में है | क्योंकि आत्मा ईश्वर का अंश है वह निष्काम है नित्य है शुद्ध
स्वरूप परिपूर्ण  परम निर्मल अविनाशी सच्चिदानन्द है | आज के समय में तो भोग सामग्री का विस्तार चरम सीमा तक पहुँच रहा है और जानते हुए और न जानते हुए भी अकसर जनता इस बहाव में बहती जा रही है |

एक और मुख्य बाधा जो मानव समाज को ईश्वरमय जीवन अपनाने से दूर रख रही है वो है मार्ग  दर्शन का अभाव | इस समय दुनिया में लगभग सारी जनता चार पाँच मजहबों में बंटी हुई है | परन्तु फिर भी सन्तों, महात्माओं, धर्म के बानी पैगम्बरों, फ़कीरों, महन्त, पुरोहित इत्यादि के आदेशों को, उनकी शिक्षा और उपदेशों को अपने जीवन में नहीं ढालते परन्तु धर्म के ठेकेदार बने हुए हैं | न अपने विकारों पर कन्ट्रोल है न मौज मेले की ख्वाहिशों से उपर सत्ता है और न ही आध्यात्मिक ज्ञान है | परन्तु समाज के सामने अपने आपको धार्मिक नेता के तौर पर पेश करते हैं | सत्पुरूषों ने तो हिदायत की होती है कि सब ख़लकत में मालिक का नूर देखो, सबसे प्यार करो, गरीब बेसहारा की मदद करो | अपने से निर्बल लोगों की मदद करो, रहम, दया, करूणा की भावना रखो, जन कल्याण का रास्ता अपनाओ | दुखियों का दु:ख दूर करो | अपनी जिन्दगी को ईश्वर की याद में व्यतीत करो |

परन्तु ये मजहब के ठेकेदार अपने जीवन में इन असूलों को नहीं अपनाते | धार्मिक ग्रन्थ पढ़-पढ़ कर लोगों को सुना देते हैं | उसका असर जनता पर क्या हो सकता है ? ऐसे लोग समाज को गुमराह करने वाले हैं चाहे वो किसी धर्म, मजहब या पंथ में हों |  वो आम जनता में ईश्वरमय जीवन का सार्थक प्रचार नहीं कर सकते | चरित्रहीन, विचारहीन, विवेकहीन, कर्महीन मजहबी नेता जनता को रूहानी सकून या शान्ति का वह मार्ग नहीं दिखा सकते जो ईश्वरमय जीवन को अपनाने से मिलता है |

बाधाओं की अगली श्रेणी है – अहंकार की प्रबलता | कई पढ़े लिखे ज्ञानी इस बाधा को पार नहीं कर पाते | कई समझदार लोग हैं जो महसूस करते हैं कि भोगमयी जीवन में जहाँ इन्द्रिय सुख मिलते हैं वहाँ साथ ही राग, द्वेष, चिन्ता, भय, शोक परेशानियाँ मनुष्य को पीड़ित करती हैं | इसलिए वो सुख और शान्ति के लिए  उत्सुकता रखते हैं जतन करके सन्तं, महात्माओं फ़कीरों से मिलते हैं उनके सत्संग सुनते हैं | सत् तत् सम्बन्धी ग्रन्थों और अन्य साहित्य का स्वाध्याय भी करते हैं कई अनुशासन भी धारण करते हैं जैसे सादा लिबास, भोजन, नशे से परहेज, सिनेमा तमाशा से परहेज, संयमी जीवन, सिमरण ध्यान में समय लगाना | इनमें से कुछ लोग घर बार छौड़कर आश्रमों में रहने लगते हैं, परन्तु चित्त में बसे हुए अहंकार या प्रबल अहंभाव को नहीं छौड़ पाते उसका परिणाम यह होता है कि न जीवन ईश्वरमय बनता है और न ही शाश्वत शान्ति प्राप्त करने का लक्ष्य पूर्ण होता है | अन्त समय निराशे और प्यासे ही संसार से चले जाते हैं |

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