आत्मबल अर्थात् आत्म-शक्ति

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हर आत्मा में अक्षुण्ण बल है | इस  का सदुपयोग हो जाए, तो हर मनुष्य कमाल कर सकता है | वह अपने ही नहीं दूसरों के जीवन जो भी धन्य कर सकता है | वह बहुत कुछ सृजन कर सकता है | हर आत्मा की अलग-अलग विशेषताएँ हैं | सबका अलग-अलग स्वभाव है | सबकी अलग-अलग सृजनात्मकता है | सबके  लिए कोई एक मार्ग निर्धारित नहीं किया जा सकता | कोई दूसरा किसी के बारे में पूरी तरह जान भी नहीं सकता | किसी ओर के किए अपनी कोई राय बनाने में पूर्ण सत्यता हो ही नहीं सकती | इसी तरह अपने लिए पूर्ण ज्ञान बाहर कहीं से मिल ही नहीं सकता | वह तो अपने भीतर ही खोजना होगा | एक गुरू १00 शिष्यों को लगातार १0 साल तक एक ही तरह की शिक्षा देता है, लेकिन शिक्षा लेने के पश्चात सबमें कुछ न कुछ भेद होगा | सबका कर्म करने का, सोचने का, सृजन करने का तरीका अलग-अलग होगा | कोई भी दो हूबहू एक तरह के नहीं हो सकते | बाहर से कितना भी ज्ञान ले लो, लेकिन साथ में आत्म-शक्ति का ज्ञान भी करना होगा | वहाँ दूसरों पर निर्भर मत रहो | दूसरे वह मार्ग बता देंगे , जो आपके अनुकूल नहीं है | आपकी शक्ति किसी ओर तरफ़ प्रवाह कर  रही है और आप किसी और के कहने से दूसरी तरफ़ जाने का प्रयास करेंगे, तो क्या स्थिति होगी, आप समझ सकते हैं | …लेकिन हमें दूसरों पर भरोसा ज्यादा और अपने आप पर भरोसा कम है | बात यह नहीं है कि दूसरे जो बात कर रहे हैं, वह गलत है, वह भी सत्य हो सकती है, परम सत्य हो सकती है, बड़ी ही मूल्यवान हो सकती है, आपके लिए बड़ी उपयोगी हो सकती है, लेकिन वह कितनी ही मूल्यवान बात हो उसमें एक अधूरापन रहेगा ही |  भाव यह है कि – आप लाख बाहर से ज्ञान अर्जित कर लो, जब तक अपनी आत्म-शक्ति का ज्ञान नहीं करोगे, तब तक बात अधूरी ही रहेगी |

हर इन्सान के भीतर एक बहुत विशाल जगत है | बहुत सारी ऊर्जाएँ हैं, जिनमें लगातार प्रवाहित होने की प्रवृति  है | उनको रोकना असम्भव हैॆ | यदि उनको आप सही मार्ग नहीं दे पाए, तो वे या तो कुंठित होकर आपको मानसिक रुग्णावस्था में डाल देगी या विध्वंसात्मक बन जाएगी | ऊर्जा हमेशा सृजन करना चाहती है, पर जब सृजन का अवसर नहीं मिलता है, तो वह विध्वंस की ओर बहने लगती है | कई ऐसे मनुष्य होते हैं, जिनमें ऊर्जा का वेग बड़ा ही प्रबल होता है | वह ऊर्जा ऐसा कुछ करना चाहती है, जिसे सारा संसार जाने | उस ऊर्जा का यदि सही उपयोग हो जाए, तो इस संसार के लिए बड़ा ही सुन्दर कार्य हो सकता है, और यदि इसका सही उपयोग नहीं हो पाया, तो वह इन्सान या तो पागल हो सकता है या कोई विनाश कर सकता है | किसमें कितनी ऊर्जा है, वह क्या करना चाहती है, किस प्रकार उसको बेहतर दिशा दी  जा सकती है, इस बारे में जितना दूसरों पर निर्भर रहोगे, उतने ही ज्यादा गुमराह होओगे | दूसरा कितना ही अच्छा हो, कितना ही अनुभवी ह, आपके अन्तर को वह नहीं पढ़ सकता | यह यात्रा तो स्वयं को ही करनी होगी | दूसरा
आपको जगा सकता है, बता नहीं सकता | जिन लोगों ने इस बात को समझ लिया वे किसी के पिछलग्गू नहीं बनते | वे आत्म-शक्ति को स्वयं पहचानते हैं | वे अपनी आत्मा की आवाज़ को बड़े ध्यान से सुनते हैं | वे दूसरों की बातों में आकर भयग्रस्त नहीं होते हैं, अपनी आत्मा की आवाज़ को दबाते नहीं हैं | स्वयं पर अपने विश्वास को कमजोर नहीं करते हैं | वे आँखे बन्द करके नकल नहीं करते, बल्कि अपना कुछ अलग करने का जज़्बा रखतेएं | इसीलिए यह देखने में आता है कि सृजन करने वालों का सबका अपना-अपना तरीका होता है |
मानव जीवन पूर्णता लिए हुए है, यह बहुत मूल्यवान  उपलब्धि है | यह परमात्मा की एक बहुत विलक्षण और पवित्र कृति है | यह आनन्द का सागर है | इससे बेहतर इस ब्राह्माण्ड में कुछ भी नहीं |

क्या  हम  रोज़-रोज़ अपने आपको पतित कहकर परमात्मा द्वारा दिए गए इस अनमोल जीवन का अपमान नहीं कर रहे हैं ? क्या हम अपने आपको पतित कहकर इस जीवन में कुछ श्रेष्ठ कर पाएँगे ?  अपने आपको पतित समझना सबसे गिरी हुई बात है | जैसा हम अपने बारे में सोचेंगे, वैसे ही हम बनते जाएँगे | हमारे भीतर यह बात बहुत गहरे में बैठ गई है कि हम कमजोर हैं, इसलिए हम सहारा खोजते रहते हैं | हम सोचते हैं कि किसी का सहारा मिल जाए, तो शायद मैं अपने जीवन में कुछ कर सकूँ | हमने अपने भीतर उस शक्ति को विस्मृत कर दिया, जो जगत का निर्माण कर सकती है | हमने अपनी ऊर्जा को संकुचित कर लिया |  सारा ध्यान इस बात पर केन्द्रित कर लिया कि कहीं से कुछ मिल जाए और मैं बस उसका सहारा लेकर चल पडूँ | अपनी जिम्मेदारी के दायरे को  बहुत कम कर लिया | हम दूसरों की कहानियाँ बड़े गर्व से पढ़ते हैं, पर कहानी बनाने की नहीं सोचते हैं |

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