जीवन में एक क्षण की असावधानी भी बहुत नुकसानदेह हो सकती है

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असावधानी नुकसानदेह हो सकती है |

एक राजा बहुत ही सदाचारी, प्रजापालक व स्वभाव से ही धर्मात्मा था | उसका एक पुत्र भी था | वह भी अपने पिता की भाँति सुशील, गुणवान, मधुरभाषी, पराक्रमी व आज्ञाकारी था |

एक दिन राजा ने प्रजा के मनोरंजन हेतु एक आयोजन करवाया, जिसमें नाट्य कला में प्रवीण नट को आमंत्रित किया गया | अगर यह नट राजा को अपनी नाट्य कला के द्वारा प्रसन्न कर लेता है, तो उसे विशेष पुरस्कार दिया जाने वाला था | निर्णायक के तौर पर  राजा ने एक महात्मा जी को भी आमन्त्रित किया, जिन्होंने गृहस्थ आश्रम का त्याग कर दिया था व अपने सम्पूर्ण मोह-बन्धनों को तोड़कर “वसुधैव कुटुम्बकम् ” की भावना से पूरित जीवन व्यतीत कर रहे थे |

अयोजन शुरू होने वाला था | एक ऊँचे सिहांसन पर  राजा बैठ गया | साथ ही उसका पुत्र भी अपने आसन पर जा बैठा |  जब महात्मा जी आए, तो उन्हें भी उचित स्थान दिया गया | फ़िर  राजा ने मंत्री को आज्ञा दी – अशर्फ़ियों की तीन पोटलियाँ बनाईं जाएँ | एक मुझको, एक युवराज को व एक महात्मा जी को दे दी जाए | आज्ञा का पालन हुआ | उसके बाद राजा ने घोषणा करवाई – “जब नट करतब दिखाएगा, तो सबसे पहले राजा ही उसे उपहारस्वरूप अशर्फ़ियाँ देगा |

उसके उपरांत ही प्रजा नट को कोई उपहार दे सकेगी |”  राजा की आज्ञा से नट ने अपनी नाट्य कला का प्रदर्शन प्रारम्भ किया | सभी प्रसन्न हो रहे थे |  किन्तु राजा ने नट को कोई उपहार नहीं दिया | इसलिए प्रजा ने भी नट को कुछ नहीं दिया | यूँ ही रात्रि का प्रथम प्रहर व्यतीत हो गया |

रात्रि के दूसरे प्रहर में नट ने  और भी कठिन कलाबाजियाँ दिखानी शुरू कर दीं | कभी पतली रस्सी पर चलकर दिखाता, कभी आग में से कूद जाता… किन्तु इतना करने के बाद भी राजा ने अशर्फ़ियों को हाथटक नहीं लगाया |

अब रात्रि के तीसरे प्रहर में नट ने कठिन से कठिनतम करतब करने शुरू कर दिए | वह पसीने से लथपथ हो गया | प्रजा की तालियों की गड़गड़ाहट तो सुनाई पड़ रही थी | किन्तु राजा न जाने कहाँ आत्मलीन हो गया था | उसने नट को अब भी कोई उपहार नहीं दिया |

अब रात्रि की मात्र एक घड़ी शेष रह गई थी | नट का ध्यान नटनी के चेहरे पर गया | नट को नटनी की परेशानी समझने में देरी नहीं लगी | वो सोच रही थी – ‘अब क्या होगा ! क्या सारी रात्रि की मेहनत बेकार चली जाएगी ?’ तब नट ने नटनी को कुछ इन शब्दों में समझाया –

बहुत गई थोड़ी रही, पल-पल गई बिहाय |
एक घड़ी के कारणे, ना कलंक लग जाए ||

हमने सारी रात इतनी मेहनत की | हर पल नए-नए करतब दिखाए | अब तो मात्र एक ही घड़ी शेष बची है | इसमें हारना नहीं, क्योंकि अब निराश होकर बैठ गए तो सारी रात्रि की मेहनत बेकार हो जाएगी | एक घड़ी के कारण कलंक क्यों लगाया जाए ? बस थोड़े से धैर्य का हमें और परिचय देना है | क्या पता इस बची एक घड़ी में ही राजा प्रसन्न हो जाए और पुरस्कार प्रदान कर दे ! !

जैसे ही नट का वाक्य पूरा हुआ, अभी तक जो राजा आत्मलीन था, उसका ह्रदय झंकृत हो उठा | उसने तुरन्त अशर्फ़ियों से भरी हुई अपनी पोटली नट की ओर उछाल दी | नट की प्रसन्नता का तो कोई ठिकाना ही न रहा |

इन पंक्तियों से राजा को क्या शिक्षा मिली थी कि वो इतना प्रसन्न हो उठा ? दरअसल, बात यह थी कि राजा ने अपने जीवन में कभी सज्जनता को नहीं छोड़ा था |  वह  चरित्रवान भी था |  पर आज जब उस नट नटनी के साथ आई उनकी युवा-कन्या को देखा, तो उसका मन मुग्ध हो गया |  सोचने लगा कि आज अगर यह नट करतब करते-करते गिरकर मृत्यु को प्राप्त हो जाए, तो इसकी रूपवती कन्या से मैं विवाह कर लूँगा | किन्तु जैसे ही नट के वाक्य को सुना, तो उन शब्दों ने ऐसी चोट मारी कि अंतर्ह्रदय से ध्वनि प्रस्फुटित हुई – सम्पूर्ण जीवन में कमाया हुआ चरित्र इस नश्वर सौन्दर्य पर मुग्ध होकर क्यों कंलकित कर्रहा है ?  राजा ने स्वयं को कलंक से बचा लिया |

इतने में दूसरी पोटली भी नट की ओर उछलती हुई आ पहुँची |  यह पोटली राजा के पुत्र की थी |  आखिर उसे ऐसा क्या मिल गया कि वह भी खुश हो गया ?  वास्तव में अभी तक राजा का पुत्र भी अंतर्द्वन्द्व में ही उलझा हुआ था | सोच रहा था कि मेरा पिता वृद्ध हो गया है |  लेकिन मुझे राजगद्दी नहीं सौंप रहा |  तो क्यों न इसकी हत्या करके इस राज्य को हस्तगत कर लूँ ?  किन्तु नट की पंक्ति सुनकर सोचने लगा –  अब तो पिताजी के जीवन के चंद दिन ही शेष बचे हैं |  तो ऐसे धर्मात्मा पिता की हत्या कर, क्यों पितृ-हत्या का कलंक अपने सर लूँ ?  एक दिन तो राजगद्दी मेरी हो ही जाएगी |  थोड़े समय की ही तो बात है |  राजकुमार ने भी स्वयं को पाप करने से बचा लिया |

आखिर संन्यासी महात्मा को नट के इस वाक्य से क्या शिक्षा मिली थी ?  दरअसल, उन्होंने अपना सारा जीवन संन्यास में बिताया था | किन्तु कुछ दिनों से वे सोच रहे थे कि ईश्वर ने संसार भी बहुत सुन्दर बनाया है |  क्यों न मैं भी गृहस्थ जीवन व्यतीत करूँ ?  पत्नी, पुत्र, धन आदि का सुख प्राप्त कर लूँ, जिससे मैं आज तक वंचित रहा हूँ |  जब नट के वाक्य सुने, तो महात्मा जी को इन शब्दों में छिपा ईश्वरीय संदेश सुनाई पड़ा – “सारा जीवन साधना, ध्यान, तपस्या व परोपकार में बिताया है |

  अब जब भगवान के घर जाने का समय हो चला है, तो मैं भक्ति को छौड़कर विकारों की अग्नि में झुलसकर क्यों अपने जीवन को नष्ट करूँ ? ”  उन्होंने भगवान का बारम्मार धन्यवाद किया |  मन ही मन प्रभु से क्षमा याचना की |  इतने अभिभूत हो गए कि पूरी पोटली एक ही बार में नट की ओर उछाल दी | असावधानी नुकसानदेह हो सकती है |

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