अपने आपको ईश्वर के समर्पण करना

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अपने आपको ईश्वर के समर्पण करना

तुम भगवत कृपा से अपने मन का काम करवाना चाहते हो | यही तुम्हारी बड़ी भूल है| और प्रभु की सीधी तुम पर उतरने वाली कृपा की धारा में बाधा देते हो|
भगवत् कृपा से कह दो, मुक्त कण्ठ से विश्वास की मौन वाणी में, स्पष्ट कह दो कि तुम जो ठीक समझो, जब ठीक समझो, जैसे ठीक समझो, वही उस समय वैसे ही करो|
अपने को बिना किसी शर्त के, बिना कुछ बचाए, भगवत कृपा के समर्पण कर दो| फ़िर भगवत कृपा निर्बाध रूप से अपना मंगलमय दर्शन देकर तुम्हें कृतार्थ कर देगी|अगर कोई शख्स बिना वज़ह तेरे साथ र्इषर्या बनाए रखता है तो तू उसका भला ही सोच| फ़िर भी अगर वह शख्स तेरे खिलाफ़ कोई बात करता है और तू भी मुद्यत तक उससे कपट बनाए रखता है, या उसको कत्ल करने की कोशिश करता है तो गुरूमुख और मनमुख में क्या फ़र्क हुआ| जब किसी की झूठी और नाशास्ता बातों का इस कद्र असर तेरे मन या चित्त पर होता है तो जरूरी है कि सच्ची और सुच्ची तेरी भावनाओं का असर भी उसके मन पर ज़रूर होगा. बल्कि बढ़कर होगा| तुम अपने मन और चित्त को साफ़ रखो|
जीव कई तरह की गल्तियाँ ख्वामखाह करने लग जाता है| अड़ोसी पड़ोसी मचकाने वाले होते हैँ| अपनी अक्ल को बेच नहीं देना चाहिए| इससे काम लेना ही विवेक वाली
बुद्धि कहलाती है| ऐसी जगह को त्याग देना चाहिए, जिस जगह प्रभु की महिमा का विचार न हो| ऐसे साथियों को छौड़ देना चाहिए, जिनके अन्दर प्रभु चरणों से प्रीत नहीं| एेसे रिश्तेदारों को छौड़ देना चाहिए, जिनका जीवन हर वक्त भोगमयी और संसारी हो| ऐसे लोगों से हर वक्त परहेज करना चाहिए, क्योंकि उनकी वजह से हमेशा धोखे में रहोगे|
*मूर्ख* यानि अहमक से, क्योंकि वह जानता ही नहीं, किसी का नफ़ा या नुकसान क्या है|
मूर्ख किस विध खोटा – न लाह जाने न त्रोटा |
ख्वामखाह अपनी बड़ाई जताने वाले और दूसरों की ऐब जोई करने वाले से | किसी का कसूर ना होने पर भी, मतलब तोहमतें लगाते रहने वाले से डरना चाहिए| क्योंकि अपने समय को और दूसरे के वक्त को भी बर्बाद करेगें|
*डरपोक से*- क्योंकि ऐसा शख्स ज़रूरत के वक्त तबाही में डालेगा|
*अपनी प्रशंसाआप करने वालों से*- जो शख्स कहता है कि मैं गुरमुख हूँ, ईमानदार हूँ|
वह कभी पवित्र नेक भाववाला नहीं हो सकता| उसकी मीठी मीठी बातों में कभी नहीं आना चाहिए| गुरमुख को चाहिए कि तप अभ्यास जो भी करना हो, तन्हाई में करें| ऐसे समय में जितनी भी प्रभु की महिमा बन सकें करे| यह भी ख्याल रखो कि जो शख्स दूसरे लोगों की बातें तेरे आगे करता है वह तेरी बातें दूसरों तक ज़रूर पहुँचाएगा| अक्लमंद बाहोश वह ही है जो संसार को दुख सरूप और नाशवान समझते हुए अपनी बेहतरी करता हुआ अपने अन्त को ठीक कर रहा हो| जिसका मन बिगड़ा हुआ है, वह पागल और हैवान है| संसार में इन्द्रियों से सरकश कोई दरिन्दा भी नहीं है| इन्द्रियों के सुधार में तेरा सुधार है| जो संसार और संसारियों की नज़दीकी अच्छी समझता है| ऐसों से फ़कीर थोड़ा प्रेम करते हैं| प्रभु की कृपा के पात्र ऐसे जीव नहीं हो सकते, ईश्वर भी उनके ह्रदय में सतभाव नहीं आने देते| किसी फ़कीर से एक समझदार गुरमुख ने पूछा – क्या हाल है?
फ़कीर ने जवाब दिया – प्रेमी, ऐसे शख्स का क्या हाल होगा, जिसकी आयु हर घड़ी, हर लमह कमी की तरफ़ जा रही है, और ऐब, गुनाह दिन-ब-दिन बढ़ रहे हैं | शरीर यानि जिस्म की सफ़ाई से ज्यादा दिल की सफ़ाई करो| चित्त को पवित्र करना ज्यादा बेहतर है| गुरमुख मन को पवित्र करने में लगे रहते हैं| मनमुखी कागजों को काला करते रहते हैं|
दो विचार याद रखो –
*एक चीज़ तेरे वास्ते है, और एक चिज़ तेरे वास्ते नहीं है|* जो चीज़ तेरे भाग्यों में है, वह अवश्य खिंची हुई तेरे पास चली आवेगी| जो चीज़ दूसरे के वास्ते बनी हुई है, ख्वामखाह उस पर अपना बनाने की कोशिश कितनी भी करोगे, वह चीज़ तुझे प्राप्त नहीं हो सकती, क्योंकि वह तेरे भाग्यों में नही है|
” कर्महीन नर पावत नाहीं” इस वास्ते सदा अपने मन , बुद्धि को पवित्र बनाओ| जितने विचार सुनते जाओ, बहुत सुनने से बेहतर है, अपना मन शीशे की तरह साफ़ रखो| अपनी तरफ़ से किसी का बुरा ना सोचो | हर समय अपने आपको प्रभु आज्ञा में दृढ़ करते रहो |
अच्छाई, बुराई उस मालिक कि आज्ञा में समझो| हर समय सत् सिमरण और सत् सेवा में लगे रहने का यत्न करो |

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